दोहा 37
जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला॥ कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू॥१॥
भावार्थ
जिन्होंने खेलसे ही समुद्रको बँधा लिया और जो प्रभु सेनासहित सुबेल पर्वतपर उतर पड़े, उन सूर्यकुलके ध्वजास्वरूप ( कीर्तिको बढ़ानेवाले ) करुणामय भगवान्ने आपहीके हितके लिये दूत भेजा॥ १ ॥
सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महुँ मृगपति जथा॥ अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके॥२॥
भावार्थ
जिसने बीच सभामें आकर आपके बलको उसी प्रकार मथ डाला जैसे हाथियोंके झुंडमें आकर सिंह [ उसे छिन्न-भिन्न कर डालता है ]। रणमें बाँके अत्यन्त विकट वीर अंगद और हनुमान् जिनके सेवक हैं, ॥ २॥
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू॥ अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा॥३॥
भावार्थ
हे पति! उन्हें आप बार-बार मनुष्य कहते हैं। आप व्यर्थ ही मान, ममता और मदका बोझा ढो रहे हैं! हा प्रियतम! आपने श्रीरामजीसे विरोध कर लिया और कालके विशेष वश होनेसे आपके मनमें अब भी ज्ञान नहीं उत्पन्न होता॥ ३ ॥
काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा॥ निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं॥४॥
भावार्थ
काल दण्ड ( लाठी ) लेकर किसीको नहीं मारता। वह धर्म, बल, बुद्धि और विचारको हर लेता है। हे स्वामी! जिसका काल ( मरण-समय ) निकट आ जाता है, उसे आपहीकी तरह भ्रम हो जाता है॥ ४॥
दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु। कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु॥३७॥
भावार्थ
आपके दो पुत्र मारे गये और नगर जल गया। [ जो हुआ सो हुआ ] हे प्रियतम! अब भी [ इस भूलकी ] पूर्ति ( समाप्ति ) कर दीजिये ( श्रीरामजीसे वैर त्याग दीजिये ), और हे नाथ! कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीको भजकर निर्मल यश लीजिये॥ ३७॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें