दोहा 13b
देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घमंड दामिनी बिलासा॥ मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा॥ १ ॥
भावार्थ
हे विभीषण! दक्षिण दिशाकी ओर देखो, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली चमक रही है। भयानक बादल मीठे-मीठे ( हलके-हलके ) स्वरसे गरज रहा है। कहीं कठोर ओलोंकी वर्षा न हो!॥१॥
कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला॥ लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंधर देख अखारा॥ २॥
भावार्थ
विभीषण बोले—हे कृपालु! सुनिये, यह न तो बिजली है, न बादलोंकी घटा। लंकाकी चोटीपर एक महल है। दशग्रीव रावण वहाँ [ नाच-गानका ] अखाड़ा देख रहा है॥२॥
छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी॥ मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका॥ ३॥
भावार्थ
रावणने सिरपर मेघडंबर ( बादलोंके डंबर-जैसा विशाल और काला ) छत्र धारण कर रखा है। वही मानो बादलोंकी अत्यन्त काली घटा है। मन्दोदरीके कानोंमें जो कर्णफूल हिल रहे हैं, हे प्रभो! वही मानो बिजली चमक रही है॥३॥
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा॥ प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना॥ ४ ॥
भावार्थ
हे देवताओंके सम्राट्! सुनिये, अनुपम ताल और मृदंग बज रहे हैं। वही मधुर [ गर्जन ] ध्वनि है। रावणका अभिमान समझकर प्रभु मुसकराये। उन्होंने धनुष चढ़ाकर उसपर बाणका सन्धान किया;॥४॥
छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान। सब कें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान॥ १३ (क) ॥
भावार्थ
और एक ही बाणसे [ रावणके ] छत्र-मुकुट और [ मन्दोदरीके ] कर्णफूल काट गिराये। सबके देखते-देखते वे जमीनपर आ पड़े, पर इसका भेद ( कारण ) किसीने नहीं जाना॥१३ ( क )॥
अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग। रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग॥ १३ (ख) ॥
भावार्थ
ऐसा चमत्कार करके श्रीरामजीका बाण [ वापस ] आकर [ फिर ] तरकसमें जा घुसा। यह महान् रस-भंग ( रंगमें भंग ) देखकर रावणकी सारी सभा भयभीत हो गयी॥१३ ( ख )॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें