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दोहा 14

मन्दोदरीका फिर रावणको समझाना और श्रीरामकी महिमा कहना

चौ०

कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा॥ सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी॥ १ ॥

भावार्थ

न भूकम्प हुआ, न बहुत जोरकी हवा ( आँधी ) चली। न कोई अस्त्र-शस्त्र ही नेत्रोंसे देखे। [ फिर ये छत्र, मुकुट और कर्णफूल कैसे कटकर गिर पड़े ? ] सभी अपने-अपने हृदयमें सोच रहे हैं कि यह बड़ा भयङ्कर अपशकुन हुआ!॥१॥

चौ०

दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई॥ सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही॥ २ ॥

भावार्थ

सभाको भयभीत देखकर रावणने हँसकर युक्ति रचकर ये वचन कहे—सिरोंका गिरना भी जिसके लिये निरन्तर शुभ होता रहा है, उसके लिये मुकुटका गिरना अपशकुन कैसा ?॥२॥

चौ०

सयन करहु निज निज गृह जाई। गवने भवन सकल सिर नाई॥ मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ॥ ३ ॥

भावार्थ

अपने-अपने घर जाकर सो रहो [ डरनेकी कोई बात नहीं है ] तब सब लोग सिर नवाकर घर गये। जबसे कर्णफूल पृथ्वीपर गिरा, तबसे मन्दोदरीके हृदयमें सोच बस गया॥३॥

चौ०

सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी॥ कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू॥४॥

भावार्थ

नेत्रोंमें जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह [ रावणसे ] कहने लगी—हे प्राणनाथ! मेरी विनती सुनिये। हे प्रियतम! श्रीरामसे विरोध छोड़ दीजिये। उन्हें मनुष्य जानकर मनमें हठ न पकड़े रहिये॥४॥

दो०

बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु। लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥१४॥

भावार्थ

मेरे इन वचनोंपर विश्वास कीजिये कि वे रघुकुलके शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी विश्वरूप हैं—( यह सारा विश्व उन्हींका रूप है ) वेद जिनके अङ्ग-अङ्गमें लोकोंकी कल्पना करते हैं॥१४॥

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