दोहा 12b
श्रीरामजीके बाणसे रावणके मुकुट-छत्रादिका गिरना
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी॥ मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी॥ १ ॥
भावार्थ
पूर्व दिशारूपी पर्वतकी गुफामें रहनेवाला, अत्यन्त प्रताप, तेज और बलकी राशि यह चन्द्रमारूपी सिंह अन्धकाररूपी मतवाले हाथीके मस्तकको विदीर्ण करके आकाशरूपी वनमें निर्भय विचर रहा है॥ १ ॥
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा॥ कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई॥ २ ॥
भावार्थ
आकाशमें बिखरे हुए तारे मोतियोंके समान हैं, जो रात्रिरूपी सुन्दर स्त्रीके शृङ्गार हैं। प्रभुने कहा—भाइयो! चन्द्रमामें जो कालापन है वह क्या है ? अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार कहो॥ २ ॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई॥ मारेउ राहु ससिहि कह कोई। उर महँ परी स्यामता सोई॥ ३ ॥
भावार्थ
सुग्रीवने कहा—हे रघुनाथजी! सुनिये। चन्द्रमामें पृथ्वीकी छाया दिखायी दे रही है। किसीने कहा—चन्द्रमाको राहुने मारा था। वही [ चोटका ] काला दाग हृदयपर पड़ा हुआ है॥३॥
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा॥ छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं॥ ४ ॥
भावार्थ
कोई कहता है—जब ब्रह्माने [ कामदेवकी स्त्री ] रतिका मुख बनाया, तब उसने चन्द्रमाका सार भाग निकाल लिया [ जिससे रतिका मुख तो परम सुन्दर बन गया, परन्तु चन्द्रमाके हृदयमें छेद हो गया ]। वही छेद चन्द्रमाके हृदयमें वर्तमान है, जिसकी राहसे आकाशकी काली छाया उसमें दिखायी पड़ती है॥४॥
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा॥ बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी॥ ५ ॥
भावार्थ
प्रभु श्रीरामजीने कहा—विष चन्द्रमाका बहुत प्यारा भाई है। इसीसे उसने विषको अपने हृदयमें स्थान दे रखा है। विषयुक्त अपने किरणसमूहको फैलाकर वह वियोगी नर-नारियोंको जलाता रहता है॥५॥
कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास। तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास॥ १२ (क) ॥
भावार्थ
हनुमान्जीने कहा—हे प्रभो! सुनिये, चन्द्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी सुन्दर श्याम मूर्ति चन्द्रमाके हृदयमें बसती है, वही श्यामताकी झलक चन्द्रमामें है॥१२ ( क )॥
पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपानिधान॥ १२ (ख) ॥
भावार्थ
पवनपुत्र हनुमान्जीके वचन सुनकर सुजान श्रीरामजी हँसे। फिर दक्षिणकी ओर देखकर कृपानिधान प्रभु बोले— ॥१२ ( ख )॥
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