दोहा 101b
राम-रावण-युद्ध, रावण-वध, सर्वत्र जयध्वनि
जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड॥ बेताल भूत पिसाच। कर धरें धनु नाराच॥१॥
भावार्थ
जब उसने पाखण्ड ( माया ) रचा, तब भयङ्कर जीव प्रकट हो गये। बेताल, भूत और पिशाच हाथोंमें धनुष-बाण लिये प्रकट हुए!॥१॥
जोगिनि गहें करबाल। एक हाथ मनुज कपाल॥ करि सद्य सोनित पान। नाचहिं करहिं बहु गान॥२॥
भावार्थ
योगिनियाँ एक हाथमें तलवार और दूसरे हाथमें मनुष्यकी खोपड़ी लिये ताजा खून पीकर नाचने और बहुत तरहके गीत गाने लगीं॥२॥
धरु मारु बोलहिं घोर। रहि पूरि धुनि चहुँ ओर॥ मुख बाइ धावहिं खान। तब लगे कीस परान॥३॥
भावार्थ
वे ‘पकड़ो, मारो’ आदि घोर शब्द बोल रही हैं। चारों ओर ( सब दिशाओंमें ) यह ध्वनि भर गयी। वे मुख फैलाकर खाने दौड़ती हैं। तब वानर भागने लगे॥३॥
जहँ जाहिं मर्कट भागि। तहँ बरत देखहिं आगि॥ भए बिकल बानर भालु। पुनि लाग बरषै बालु॥४॥
भावार्थ
वानर भागकर जहाँ भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं। वानर-भालू व्याकुल हो गये। फिर रावण बालू बरसाने लगा॥४॥
जहँ तहँ थकित करि कीस। गर्जेउ बहुरि दससीस॥ लछिमन कपीस समेत। भए सकल बीर अचेत॥५॥
भावार्थ
वानरोंको जहाँ-तहाँ थकित ( शिथिल ) कर रावण फिर गरजा। लक्ष्मणजी और सुग्रीवसहित सभी वीर अचेत हो गये॥५॥
हा राम हा रघुनाथ। कहि सुभट मीजहिं हाथ॥ एहि बिधि सकल बल तोरि। तेहिं कीन्ह कपट बहोरि॥६॥
भावार्थ
हा राम! हा रघुनाथ! पुकारते हुए श्रेष्ठ योद्धा अपने हाथ मलते ( पछताते ) हैं। इस प्रकार सबका बल तोड़कर रावणने फिर दूसरी माया रची॥६॥
प्रगटेसि बिपुल हनुमान। धाए गहे पाषान॥ तिन्ह रामु घेरे जाइ। चहुँ दिसि बरूथ बनाइ॥७॥
भावार्थ
उसने बहुत-से हनुमान् प्रकट किये, जो पत्थर लिये दौड़े। उन्होंने चारों ओर दल बनाकर श्रीरामचन्द्रजीको जा घेरा॥७॥
मारहु धरहु जनि जाइ। कटकटहिं पूँछ उठाइ॥ दहँ दिसि लँगूर बिराज। तेहिं मध्य कोसलराज॥८॥
भावार्थ
वे पूँछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारने लगे, ‘मारो, पकड़ो, जाने न पावे।’ उनके लंगूर ( पूँछ ) दसों दिशाओंमें शोभा दे रहे हैं और उनके बीचमें कोसलराज श्रीरामजी हैं॥८॥
तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही। जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही॥ प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी। रघुबीर एकहिं तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी॥१॥
भावार्थ
उनके बीचमें कोसलराजका सुन्दर श्याम शरीर ऐसी शोभा पा रहा है, मानो ऊँचे तमाल वृक्षके लिये अनेक इन्द्रधनुषोंकी श्रेष्ठ बाड़ ( घेरा ) बनायी गयी हो। प्रभुको देखकर देवता हर्ष और विषादयुक्त हृदयसे ‘जय, जय, जय’ ऐसा बोलने लगे। तब श्रीरघुवीरने क्रोध करके एक ही बाणसे निमेषमात्रमें रावणकी सारी माया हर ली॥१॥
माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे। सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे॥ श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं। सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं॥ २ ॥
भावार्थ
माया दूर हो जानेपर वानर-भालू हर्षित हुए और वृक्ष तथा पर्वत ले-लेकर सब लौट पड़े। श्रीरामजीने बाणोंके समूह छोड़े, जिनसे रावणके हाथ और सिर फिर कट-कटकर पृथ्वीपर गिर पड़े। श्रीरामजी और रावणके युद्धका चरित्र यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पोंतक गाते रहें, तो भी वे उसका पार नहीं पा सकते॥२॥
ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास। जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास॥१०१ (क)॥
भावार्थ
उसी चरित्रके कुछ गुणगण मन्दबुद्धि तुलसीदासने कहे हैं, जैसे मक्खी भी अपने पुरुषार्थके अनुसार आकाशमें उड़ती है॥१०१ ( क )॥
काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस। प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस॥१०१ (ख)॥
भावार्थ
सिर और भुजाएँ बहुत बार काटी गयीं। फिर भी वीर रावण मरता नहीं। प्रभु तो खेल कर रहे हैं; परन्तु मुनि, सिद्ध और देवता उस क्लेशको देखकर ( प्रभुको क्लेश पाते समझकर ) व्याकुल हैं॥१०१ ( ख )॥
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