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दोहा 102

चौ०

काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई॥ मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा॥१॥

भावार्थ

काटते ही सिरोंका समूह बढ़ जाता है जैसे प्रत्येक लाभपर लोभ बढ़ता है। शत्रु मरता नहीं और परिश्रम बहुत हुआ। तब श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणकी ओर देखा॥१॥

चौ०

उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा॥ सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक॥२॥

भावार्थ

[ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! जिसकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं। [ विभीषणजीने कहा— ] हे सर्वज्ञ! हे चराचरके स्वामी! हे शरणागतके पालन करनेवाले! हे देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले! सुनिये—॥२॥

चौ०

नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें॥ सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला॥३॥

भावार्थ

इसके नाभिकुण्डमें अमृतका निवास है। हे नाथ! रावण उसीके बलपर जीता है। विभीषणके वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजीने हर्षित होकर हाथमें विकराल बाण लिये॥३॥

चौ०

असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना॥ बोलहिं खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू॥४॥

भावार्थ

उस समय नाना प्रकारके अशकुन होने लगे। बहुत-से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगे। जगत्‌के दुःख ( अशुभ ) को सूचित करनेके लिये पक्षी बोलने लगे। आकाशमें जहाँ-तहाँ केतु ( पुच्छल तारे ) प्रकट हो गये॥४॥

चौ०

दस दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा॥ मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्रवहिं नयन मग बारी॥५॥

भावार्थ

दसों दिशाओंमें अत्यन्त दाह होने लगा ( आग लगने लगी )। बिना ही पर्व ( योग ) के सूर्यग्रहण होने लगा। मन्दोदरीका हृदय बहुत काँपने लगा। मूर्तियाँ नेत्र-मार्गसे जल बहाने लगीं॥५॥

छं०

प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही। बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही॥ उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहिं जय जए। सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए॥

भावार्थ

मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाशसे वज्रपात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बहने लगी, पृथ्वी हिलने लगी, बादल रक्त, बाल और धूलकी वर्षा करने लगे। इस प्रकार इतने अधिक अमङ्गल होने लगे कि उनको कौन कह सकता है? अपरिमित उत्पात देखकर आकाशमें देवता व्याकुल होकर जय-जय पुकार उठे। देवताओंको भयभीत जानकर कृपालु श्रीरघुनाथजी धनुषपर बाण सन्धान करने लगे।

दो०

खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस। रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥१०२॥

भावार्थ

कानोंतक धनुषको खींचकर श्रीरघुनाथजीने इकतीस बाण छोड़े। वे श्रीरामचन्द्रजीके बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों॥१०२॥

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