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दोहा 100

चौ०

अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई॥ राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही॥१॥

भावार्थ

ऐसा कहकर और सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाकर फिर त्रिजटा अपने घर चली गयी। श्रीरामचन्द्रजीके स्वभावका स्मरण करके जानकीजीको अत्यन्त विरहव्यथा उत्पन्न हुई॥ १॥

चौ०

निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती॥ करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी॥२॥

भावार्थ

वे रात्रिकी और चन्द्रमाकी बहुत प्रकारसे निन्दा कर रही हैं [ और कह रही हैं— ] रात युगके समान बड़ी हो गयी, वह बीतती ही नहीं। जानकीजी श्रीरामजीके विरहमें दु:खी होकर मन-ही-मन भारी विलाप कर रही हैं॥ २॥

चौ०

जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अरु बाहू॥ सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा॥३॥

भावार्थ

जब विरहके मारे हृदयमें दारुण दाह हो गया, तब उनका बायाँ नेत्र और बाहु फड़क उठे। शकुन समझकर उन्होंने मनमें धैर्य धारण किया कि अब कृपालु श्रीरघुवीर अवश्य मिलेंगे॥ ३॥

चौ०

इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा॥ सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही॥४॥

भावार्थ

यहाँ आधी रातको रावण [ मूर्च्छासे ] जगा और अपने सारथिपर रुष्ट होकर कहने लगा—अरे मूर्ख! तूने मुझे रणभूमिसे अलग कर दिया। अरे अधम! अरे मन्दबुद्धि! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है!॥ ४॥

चौ०

तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा। भोरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा॥ सुनि आगवनु दसानन केरा। कपिदल खरभर भयउ घनेरा॥५॥

भावार्थ

सारथिने चरण पकड़कर रावणको बहुत प्रकारसे समझाया। सबेरा होते ही वह रथपर चढ़कर फिर दौड़ा। रावणका आना सुनकर वानरोंकी सेनामें बड़ी खलबली मच गयी॥ ५॥

चौ०

जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी। धाए कटकटाइ भट भारी॥६॥

भावार्थ

वे भारी योद्धा जहाँ-तहाँसे पर्वत और वृक्ष उखाड़कर [ क्रोधसे ] दाँत कटकटाकर दौड़े॥ ६॥

छं०

धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा। अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा॥ बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो। चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो॥

भावार्थ

विकट और विकराल वानर-भालू हाथोंमें पर्वत लिये दौड़े। वे अत्यन्त क्रोध करके प्रहार करते हैं। उनके मारनेसे राक्षस भाग चले। बलवान् वानरोंने शत्रुकी सेनाको विचलित करके फिर रावणको घेर लिया। चारों ओरसे चपेटे मारकर और नखोंसे शरीर विदीर्णकर वानरोंने उसको व्याकुल कर दिया।

दो०

देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार। अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार॥१००॥

भावार्थ

वानरोंको बड़ा ही प्रबल देखकर रावणने विचार किया और अन्तर्धान होकर क्षणभरमें उसने माया फैलायी॥१००॥

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