दोहा 4
देखि पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला॥ नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई॥१॥
भावार्थ
स्वामीको अनुकूल (प्रसन्न) देखकर पवनकुमार हनुमान्जीके हृदयमें हर्ष छा गया और उनके सब दुःख जाते रहे। [ उन्होंने कहा— ] हे नाथ! इस पर्वतपर वानरराज सुग्रीव रहता है, वह आपका दास है॥ १ ॥
तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे॥ सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि॥२॥
भावार्थ
हे नाथ! उससे मित्रता कीजिये और उसे दीन जानकर निर्भय कर दीजिये। वह सीताजीकी खोज करावेगा और जहाँ-तहाँ करोड़ों वानरोंको भेजेगा॥ २ ॥
एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई॥ जब सुग्रीवंँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा॥३॥
भावार्थ
इस प्रकार सब बातें समझाकर हनुमान्जीने (श्रीराम-लक्ष्मण) दोनों जनोंको पीठपर चढ़ा लिया। जब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीको देखा तो अपने जन्मको अत्यन्त धन्य समझा॥ ३ ॥
सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भेंटेउ अनुज सहित रघुनाथा॥ कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती॥४॥
भावार्थ
सुग्रीव चरणोंमें मस्तक नवाकर आदरसहित मिले। श्रीरघुनाथजी भी छोटे भाईसहित उनसे गले लगकर मिले। सुग्रीव मनमें इस प्रकार सोच रहे हैं कि हे विधाता! क्या ये मुझसे प्रीति करेंगे ?॥ ४ ॥
तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ। पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढ़ाइ॥४॥
भावार्थ
तब हनुमान्जीने दोनों ओरकी सब कथा सुनाकर अग्निको साक्षी देकर परस्पर दृढ़ करके प्रीति जोड़ दी (अर्थात् अग्निकी साक्षी देकर प्रतिज्ञापूर्वक उनकी मैत्री करवा दी)॥ ४ ॥
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