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दोहा 3

चौ०

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें॥ नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा॥१॥

भावार्थ

हे नाथ! यद्यपि मुझमें बहुत-से अवगुण हैं, तथापि सेवक स्वामीकी विस्मृतिमें न पड़े (आप उसे न भूल जायँ)। हे नाथ! जीव आपकी मायासे मोहित है। वह आपहीकी कृपासे निस्तार पा सकता है॥ १ ॥

चौ०

ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥ सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥२॥

भावार्थ

उसपर हे रघुवीर! मैं आपकी दुहाई (शपथ) करके कहता हूँ कि मैं भजन-साधन कुछ नहीं जानता। सेवक स्वामीके और पुत्र माताके भरोसे निश्चिन्त रहता है। प्रभुको सेवकका पालन-पोषण करते ही बनता है (करना ही पड़ता है)॥ २ ॥

चौ०

अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई॥ तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा॥३॥

भावार्थ

ऐसा कहकर हनुमान्‌जी अकुलाकर प्रभुके चरणोंपर गिर पड़े, उन्होंने अपना असली शरीर प्रकट कर दिया। उनके हृदयमें प्रेम छा गया। तब श्रीरघुनाथजीने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया और अपने नेत्रोंके जलसे सींचकर शीतल किया॥ ३ ॥

चौ०

सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥ समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ॥४॥

भावार्थ

[ फिर कहा— ] हे कपि! सुनो, मनमें ग्लानि मत मानना (मन छोटा न करना)। तुम मुझे लक्ष्मणसे भी दूने प्रिय हो। सब कोई मुझे समदर्शी कहते हैं (मेरे लिये न कोई प्रिय है न अप्रिय) पर मुझको सेवक प्रिय है, क्योंकि वह अनन्यगति होता है (मुझे छोड़कर उसको कोई दूसरा सहारा नहीं होता)॥ ४ ॥

दो०

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥३॥

भावार्थ

और हे हनुमान्‌! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर (जड-चेतन) जगत्‌ मेरे स्वामी भगवान्‌का रूप है॥ ३ ॥

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