दोहा 5
सुग्रीवका दुःख सुनाना, बालिवधकी प्रतिज्ञा, श्रीरामजीका मित्र-लक्षण-वर्णन
कीन्हि प्रीति कछु बीच न राखा। लछिमन राम चरित सब भाषा॥ कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी॥१॥
भावार्थ
दोनोंने [ हृदयसे ] प्रीति की, कुछ भी अन्तर नहीं रखा। तब लक्ष्मणजीने श्रीरामचन्द्रजीका सारा इतिहास कहा। सुग्रीवने नेत्रोंमें जल भरकर कहा—हे नाथ! मिथिलेशकुमारी जानकीजी मिल जायँगी॥ १ ॥
मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा॥ गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता॥२॥
भावार्थ
मैं एक बार यहाँ मन्त्रियोंके साथ बैठा हुआ कुछ विचार कर रहा था। तब मैंने पराये ( शत्रु ) के वशमें पड़ी बहुत विलाप करती हुई सीताजीको आकाशमार्गसे जाते देखा था॥ २ ॥
राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी॥ मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा॥३॥
भावार्थ
हमें देखकर उन्होंने ‘राम! राम! हा राम!’ पुकारकर वस्त्र गिरा दिया था। श्रीरामजीने उसे माँगा, तब सुग्रीवने तुरंत ही दे दिया। वस्त्रको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजीने बहुत ही सोच किया॥ ३ ॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा॥ सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई॥४॥
भावार्थ
सुग्रीवने कहा—हे रघुवीर! सुनिये, सोच छोड़ दीजिये और मनमें धीरज लाइये। मैं सब प्रकारसे आपकी सेवा करूँगा, जिस उपायसे जानकीजी आकर आपको मिलें॥ ४ ॥
सखा बचन सुनि हरषे कृपासिंधु बलसींव। कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव॥५॥
भावार्थ
कृपाके समुद्र और बलकी सीमा श्रीरामजी सखा सुग्रीवके वचन सुनकर हर्षित हुए। [ और बोले— ] हे सुग्रीव! मुझे बताओ, तुम वनमें किस कारण रहते हो ?॥ ५ ॥
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