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दोहा 16

श्रीरामकी सुग्रीवपर नाराजी, लक्ष्मणजीका कोप

चौ०

बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥ फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥१॥

भावार्थ

हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा बीत गयी और परम सुन्दर शरद्-ऋतु आ गयी। फूले हुए काससे सारी पृथ्वी छा गयी। मानो वर्षा-ऋतुने [ कासरूपी सफेद बालोंके रूपमें ] अपना बुढ़ापा प्रकट किया है॥१॥

चौ०

उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा॥ सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा॥२॥

भावार्थ

अगस्त्यके तारेने उदय होकर मार्गके जलको सोख लिया, जैसे सन्तोष लोभको सोख लेता है। नदियों और तालाबोंका निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोहसे रहित संतोंका हृदय!॥२॥

चौ०

रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥ जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥३॥

भावार्थ

नदी और तालाबोंका जल धीरे-धीरे सूख रहा है। जैसे ज्ञानी ( विवेकी ) पुरुष ममताका त्याग करते हैं। शरद्-ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गये। जैसे समय पाकर सुन्दर सुकृत आ जाते हैं ( पुण्य प्रकट हो जाते हैं )॥३॥

चौ०

पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी॥ जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना॥४॥

भावार्थ

न कीचड़ है न धूल; इससे धरती [ निर्मल होकर ] ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीतिनिपुण राजाकी करनी! जलके कम हो जानेसे मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख ( विवेकशून्य ) कुटुम्बी ( गृहस्थ ) धनके बिना व्याकुल होता है॥४॥

चौ०

बिनु घन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा॥ कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी॥५॥

भावार्थ

बिना बादलोंका निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्भक्त सब आशाओंको छोड़कर सुशोभित होते हैं। कहीं-कहीं ( विरले ही स्थानोंमें ) शरद्‌-ऋतुकी थोड़ी-थोड़ी वर्षा हो रही है। जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं॥५॥

दो०

चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि। जिमि हरिभगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि॥१६॥

भावार्थ

[ शरद्‌-ऋतु पाकर ] राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी [ क्रमशः विजय, तप, व्यापार और भिक्षाके लिये ] हर्षित होकर नगर छोड़कर चले। जैसे श्रीहरिकी भक्ति पाकर चारों आश्रमवाले [ नाना प्रकारके साधनरूपी ] श्रमोंको त्याग देते हैं॥१६॥

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