दोहा 17
सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा॥ फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा॥१॥
भावार्थ
जो मछलियाँ अथाह जलमें हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्रीहरिके शरणमें चले जानेपर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलोंके फूलनेसे तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होनेपर शोभित होता है॥१॥
गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा॥ चक्रबाक मन दुख निसि पेखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी॥२॥
भावार्थ
भौंरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं, तथा पक्षियोंके नाना प्रकारके सुन्दर शब्द हो रहे हैं। रात्रि देखकर चकवेके मनमें वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरेकी सम्पत्ति देखकर दुष्टको होता है॥२॥
चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही॥ सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई॥३॥
भावार्थ
पपीहा रट लगाये है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्रीशङ्करजीका द्रोही सुख नहीं पाता ( सुखके लिये झीखता रहता है )। शरद्-ऋतुके तापको रातके समय चन्द्रमा हर लेता है, जैसे संतोंके दर्शनसे पाप दूर हो जाते हैं॥३॥
देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई॥ मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा॥४॥
भावार्थ
चकोरोंके समुदाय चन्द्रमाको देखकर इस प्रकार टकटकी लगाये हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान्को पाकर उनके [ निर्निमेष नेत्रोंसे ] दर्शन करते हैं। मच्छर और डाँस जाड़ेके डरसे इस प्रकार नष्ट हो गये जैसे ब्राह्मणके साथ वैर करनेसे कुलका नाश हो जाता है॥४॥
भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ। सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ॥१७॥
भावार्थ
[ वर्षा-ऋतुके कारण ] पृथ्वीपर जो जीव भर गये थे, वे शरद्-ऋतुको पाकर वैसे ही नष्ट हो गये जैसे सद्गुरुके मिल जानेपर सन्देह और भ्रमके समूह नष्ट हो जाते हैं॥१७॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें