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दोहा 15b

शरद्-ऋतु-वर्णन

चौ०

दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥ नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥१॥

भावार्थ

चारों दिशाओंमें मेढकोंकी ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियोंके समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों वृक्षोंमें नये पत्ते आ गये हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सुशोभित हो गये हैं जैसे साधकका मन विवेक ( ज्ञान ) प्राप्त होनेपर हो जाता है॥१॥

चौ०

अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥ खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी॥२॥

भावार्थ

मदार और जवासा बिना पत्तेके हो गये ( उनके पत्ते झड़ गये )। जैसे श्रेष्ठ राज्यमें दुष्टोंका उद्यम जाता रहा ( उनकी एक भी नहीं चलती )। धूल कहीं खोजनेपर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्मको दूर कर देता है ( अर्थात्‌ क्रोधका आवेश होनेपर धर्मका ज्ञान नहीं रह जाता )॥२॥

चौ०

ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी॥ निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा॥३॥

भावार्थ

अन्नसे युक्त ( लहलहाती हुई खेतीसे हरी-भरी ) पृथ्वी कैसी शोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुषकी सम्पत्ति। रातके घने अन्धकारमें जुगनू शोभा पा रहे हैं, मानो दम्भियोंका समाज आ जुटा हो॥३॥

चौ०

महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं। जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥ कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना॥४॥

भावार्थ

भारी वर्षासे खेतोंकी क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होनेसे स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतोंको निरा रहे हैं ( उनमेंसे घास आदिको निकालकर फेंक रहे हैं )। जैसे विद्वान्‌ लोग मोह, मद और मानका त्याग कर देते हैं॥४॥

चौ०

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं॥ ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा॥५॥

भावार्थ

चक्रवाक पक्षी दिखायी नहीं दे रहे हैं; जैसे कलियुगको पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसरमें वर्षा होती है, पर वहाँ घासतक नहीं उगती। जैसे हरिभक्तके हृदयमें काम नहीं उत्पन्न होता॥५॥

चौ०

बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा॥ जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना॥६॥

भावार्थ

पृथ्वी अनेक तरहके जीवोंसे भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजाकी वृद्धि होती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होनेपर इन्द्रियाँ [ शिथिल होकर विषयोंकी ओर जाना छोड़ देती हैं ]॥६॥

दो०

कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं। जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं॥१५ (क)॥

भावार्थ

कभी-कभी वायु बड़े जोरसे चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कुपुत्रके उत्पन्न होनेसे कुलके उत्तम धर्म ( श्रेष्ठ आचरण ) नष्ट हो जाते हैं॥१५ (क)॥

दो०

कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग। बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग॥१५ (ख)॥

भावार्थ

कभी [ बादलोंके कारण ] दिनमें घोर अन्धकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है॥१५ (ख)॥

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