Ramayana.com

दोहा 58

चौ०

हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी॥ कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥१॥

भावार्थ

अपनी करनीको याद करके सतीजीके हृदयमें इतना सोच है और इतनी अपार चिन्ता है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। [ उन्होंने समझ लिया कि ] शिवजी कृपाके परम अथाह सागर हैं, इससे प्रकटमें उन्होंने मेरा अपराध नहीं कहा॥१॥

चौ०

संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी॥ निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई॥२॥

भावार्थ

शिवजीका रुख देखकर सतीजीने जान लिया कि स्वामीने मेरा त्याग कर दिया और वे हृदयमें व्याकुल हो उठीं। अपना पाप समझकर कुछ कहते नहीं बनता, परन्तु हृदय [ भीतर-ही-भीतर ] कुम्हारके आँवेके समान अत्यन्त जलने लगा॥२॥

चौ०

सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुखहेतू॥ बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥३॥

भावार्थ

वृषकेतु शिवजीने सतीको चिन्तायुक्त जानकर उन्हें सुख देनेके लिये सुन्दर कथाएँ कहीं। इस प्रकार मार्गमें विविध प्रकारके इतिहासोंको कहते हुए विश्वनाथ कैलास जा पहुँचे॥३॥

चौ०

तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बटतर करि कमलासन॥ संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥४॥

भावार्थ

वहाँ फिर शिवजी अपनी प्रतिज्ञाको याद करके बड़के पेड़के नीचे पद्मासन लगाकर बैठ गये। शिवजीने अपना स्वाभाविक रूप सँभाला। उनकी अखण्ड और अपार समाधि लग गयी॥४॥

दो०

सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं। मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं॥५८॥

भावार्थ

तब सतीजी कैलासपर रहने लगीं। उनके मनमें बड़ा दुःख था। इस रहस्यको कोई कुछ भी नहीं जानता था। उनका एक-एक दिन युगके समान बीत रहा था॥५८॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें