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दोहा 57b

चौ०

तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा॥ एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥१॥

भावार्थ

तब शिवजीने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया और श्रीरामजीका स्मरण करते ही उनके मनमें यह आया कि सतीके इस शरीरसे मेरी [ पति-पत्नीरूपमें ] भेंट नहीं हो सकती और शिवजीने अपने मनमें यह सङ्कल्प कर लिया॥१॥

चौ०

अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥ चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई॥२॥

भावार्थ

स्थिरबुद्धि शङ्करजी ऐसा विचारकर श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते हुए अपने घर ( कैलास ) को चले। चलते समय सुन्दर आकाशवाणी हुई कि हे महेश! आपकी जय हो। आपने भक्तिकी अच्छी दृढ़ता की॥२॥

चौ०

अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना॥ सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा॥३॥

भावार्थ

आपको छोड़कर दूसरा कौन ऐसी प्रतिज्ञा कर सकता है? आप श्रीरामचन्द्रजीके भक्त हैं, समर्थ हैं और भगवान्‌ हैं। इस आकाशवाणीको सुनकर सतीजीके मनमें चिन्ता हुई और उन्होंने सकुचाते हुए शिवजीसे पूछा— ॥३॥

चौ०

कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला॥ जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती॥४॥

भावार्थ

हे कृपालु! कहिये, आपने कौन-सी प्रतिज्ञा की है? हे प्रभो! आप सत्यके धाम और दीनदयालु हैं। यद्यपि सतीजीने बहुत प्रकारसे पूछा, परन्तु त्रिपुरारि शिवजीने कुछ न कहा॥४॥

दो०

सतीं हृदयँ अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य। कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य॥५७ (क)॥

भावार्थ

सतीजीने हृदयमें अनुमान किया कि सर्वज्ञ शिवजी सब जान गये। मैंने शिवजीसे कपट किया, स्त्री स्वभावसे ही मूर्ख और बेसमझ होती हैं॥५७ ( क )॥

सो०

जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि। बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥५७ (ख)॥

भावार्थ

प्रीतिकी सुन्दर रीति देखिये कि जल भी [ दूधके साथ मिलकर ] दूधके समान भाव बिकता है; परन्तु फिर कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है ( दूध फट जाता है ) और स्वाद [ प्रेम ] जाता रहता है॥५७(ख)॥

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