दोहा 59
नित नव सोचु सती उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥ मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना॥१॥
भावार्थ
सतीजीके हृदयमें नित्य नया और भारी सोच हो रहा था कि मैं इस दुःख-समुद्रके पार कब जाऊँगी। मैंने जो श्रीरघुनाथजीका अपमान किया और फिर पतिके वचनोंको झूठ जाना— ॥१॥
सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा॥ अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही॥२॥
भावार्थ
उसका फल विधाताने मुझको दिया, जो उचित था वही किया; परन्तु हे विधाता! अब तुझे यह उचित नहीं है जो शङ्करसे विमुख होनेपर भी मुझे जिला रहा है॥२॥
कहि न जाइ कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामहि सुमिर सयानी॥ जौं प्रभु दीनदयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा॥३॥
भावार्थ
सतीजीके हृदयकी ग्लानि कुछ कही नहीं जाती। बुद्धिमती सतीजीने मनमें श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण किया और कहा—हे प्रभो! यदि आप दीनदयालु कहलाते हैं और वेदोंने आपका यह यश गाया है कि आप दुःखको हरनेवाले हैं, ॥३॥
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी॥ जौं मोरें सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥४॥
भावार्थ
तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी यह देह जल्दी छूट जाय। यदि मेरा शिवजीके चरणोंमें प्रेम है और मेरा यह [ प्रेमका ] व्रत मन, वचन और कर्म ( आचरण ) से सत्य है, ॥४॥
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ। होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ॥५९॥
भावार्थ
तो हे सर्वदर्शी प्रभो! सुनिये और शीघ्र वह उपाय कीजिये जिससे मेरा मरण हो और बिना ही परिश्रम यह [ पति-परित्यागरूपी ] असह्य विपत्ति दूर हो जाय॥५९॥
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