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दोहा 94

चौ०

सखा समुझि अस परिहरि मोहू। सिय रघुबीर चरन रत होहू॥ कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा॥१॥

भावार्थ

हे सखा! ऐसा समझ, मोहको त्यागकर श्रीसीतारामजीके चरणोंमें प्रेम करो। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके गुण कहते-कहते सबेरा हो गया! तब जगत्‌का मङ्गल करनेवाले और उसे सुख देनेवाले श्रीरामजी जागे ॥ १ ॥

चौ०

सकल सौच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा॥ अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए॥२॥

भावार्थ

शौचके सब कार्य करके [ नित्य ] पवित्र और सुजान श्रीरामचन्द्रजीने स्नान किया। फिर बड़का दूध मँगाया और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित उस दूधसे सिरपर जटाएँ बनायीं। यह देखकर सुमन्त्रजीके नेत्रोंमें जल छा गया ॥ २ ॥

चौ०

हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना॥ नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा॥३॥

भावार्थ

उनका हृदय अत्यन्त जलने लगा, मुँह मलिन ( उदास ) हो गया। वे हाथ जोड़कर अत्यन्त दीन वचन बोले—हे नाथ! मुझे कोसलनाथ दशरथजीने ऐसी आज्ञा दी थी कि तुम रथ लेकर श्रीरामजीके साथ जाओ; ॥ ३ ॥

चौ०

बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई॥ लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी॥४॥

भावार्थ

वन दिखाकर, गङ्गास्नान कराकर दोनों भाइयोंको तुरंत लौटा लाना। सब संशय और संकोचको दूर करके लक्ष्मण, राम, सीताको फिरा लाना ॥ ४ ॥

दो०

नृप अस कहेउ गोसाइँ जस कहइ करौं बलि सोइ। करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ॥९४॥

भावार्थ

महाराजने ऐसा कहा था, अब प्रभु जैसा कहें, मैं वही करूँ; मैं आपकी बलिहारी हूँ। इस प्रकार विनती करके वे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें गिर पड़े और उन्होंने बालककी तरह रो दिया॥ ९४॥

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