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दोहा 93

चौ०

अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू॥ मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा॥१॥

भावार्थ

ऐसा विचारकर क्रोध नहीं करना चाहिये और न किसीको व्यर्थ दोष ही देना चाहिये। सब लोग मोहरूपी रात्रिमें सोनेवाले हैं और सोते हुए उन्हें अनेकों प्रकारके स्वप्न दिखायी देते हैं ॥ १ ॥

चौ०

एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी॥ जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा॥२॥

भावार्थ

इस जगत्‌रूपी रात्रिमें योगीलोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपञ्च ( मायिक जगत् ) से छूटे हुए हैं। जगत्‌में जीवको जागा हुआ तभी जानना चाहिये जब सम्पूर्ण भोग-विलासोंसे वैराग्य हो जाय ॥ २ ॥

चौ०

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा॥ सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू॥३॥

भावार्थ

विवेक होनेपर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, तब ( अज्ञानका नाश होनेपर ) श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होता है। हे सखा! मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ ( पुरुषार्थ ) है ॥ ३ ॥

चौ०

राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा॥ सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा॥४॥

भावार्थ

श्रीरामजी परमार्थस्वरूप ( परमवस्तु ) परब्रह्म हैं। वे अविगत ( जाननेमें न आनेवाले ), अलख ( स्थूल दृष्टिसे देखनेमें न आनेवाले ), अनादि ( आदिरहित ), अनुपम ( उपमारहित ), सब विकारोंसे रहित और भेदशून्य हैं, वेद जिनका नित्य ‘नेति-नेति’ कहकर निरूपण करते हैं ॥ ४ ॥

दो०

भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल। करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल॥९३॥

भावार्थ

वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ और देवताओंके हितके लिये मनुष्यशरीर धारण करके लीलाएँ करते हैं, जिनके सुननेसे जगत्‌के जंजाल मिट जाते हैं ॥ ९३ ॥

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