दोहा 95
तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई॥ मंत्रिहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा॥१॥
भावार्थ
[ और कहा— ] हे तात! कृपा करके वही कीजिये जिससे अयोध्या अनाथ न हो। श्रीरामजीने मन्त्रीको उठाकर धैर्य बँधाते हुए समझाया कि हे तात! आपने तो धर्मके सभी सिद्धान्तोंको छान डाला है ॥ १ ॥
सिबि दधीच हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा॥ रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना॥२॥
भावार्थ
शिबि, दधीचि और राजा हरिश्चन्द्रने धर्मके लिये करोड़ों ( अनेकों ) कष्ट सहे थे। बुद्धिमान् राजा रन्तिदेव और बलि बहुत-से संकट सहकर भी धर्मको पकड़े रहे ( उन्होंने धर्मका परित्याग नहीं किया ) ॥ २ ॥
धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना॥ मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा॥३॥
भावार्थ
वेद, शास्त्र और पुराणोंमें कहा गया है कि सत्यके समान दूसरा धर्म नहीं है। मैंने उस धर्मको सहज ही पा लिया है। इस [ सत्यरूपी धर्म ] का त्याग करनेसे तीनों लोकोंमें अपयश छा जायगा ॥ ३ ॥
संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू॥ तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ॥४॥
भावार्थ
प्रतिष्ठित पुरुषके लिये अपयशकी प्राप्ति करोड़ों मृत्युके समान भीषण सन्ताप देनेवाली है। हे तात! मैं आपसे अधिक क्या कहूँ! लौटकर उत्तर देनेमें भी पापका भागी होता हूँ ॥ ४ ॥
पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि। चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि॥९५॥
भावार्थ
आप जाकर पिताजीके चरण पकड़कर करोड़ों नमस्कारके साथ ही हाथ जोड़कर विनती करियेगा कि हे तात! आप मेरी किसी बातकी चिन्ता न करें॥ ९५ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें