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दोहा 8

चौ०

प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए॥ प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं॥१॥

भावार्थ

सबसे पहले [ रनिवासमें ] जाकर जिन्होंने ये वचन ( समाचार ) सुनाये, उन्होंने बहुत-से आभूषण और वस्त्र पाये। रानियोंका शरीर प्रेमसे पुलकित हो उठा और मन प्रेममें मग्न हो गया। वे सब मङ्गलकलश सजाने लगीं॥१॥

चौ०

चौकें चारु सुमित्राँ पूरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रूरी॥ आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी॥२॥

भावार्थ

सुमित्राजीने मणियों ( रत्नों )-के बहुत प्रकारके अत्यन्त सुन्दर और मनोहर चौक पूरे। आनन्दमें मग्न हुई श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीने ब्राह्मणोंको बुलाकर बहुत दान दिये॥२॥

चौ०

पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा॥ जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू॥३॥

भावार्थ

उन्होंने ग्रामदेवियों, देवताओं और नागोंकी पूजा की और फिर बलि भेंट देनेको कहा ( अर्थात्‌ कार्य सिद्ध होनेपर फिर पूजा करनेकी मनौती मानी ); और प्रार्थना की कि जिस प्रकारसे श्रीरामचन्द्रजीका कल्याण हो, दया करके वही वरदान दीजिये॥३॥

चौ०

गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं॥४॥

भावार्थ

कोयलकी-सी मीठी वाणीवाली, चन्द्रमाके समान मुखवाली और हिरनके बच्चेके-से नेत्रोंवाली स्त्रियाँ मङ्गलगान करने लगीं॥४॥

दो०

राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि। लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि॥८॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक सुनकर सभी स्त्री-पुरुष हृदयमें हर्षित हो उठे और विधाताको अपने अनुकूल समझकर सब सुन्दर मङ्गल-साज सजाने लगे॥८॥

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