दोहा 7
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा॥ बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा॥१॥
भावार्थ
मुनीश्वरने जिसको जिस कामके लिये आज्ञा दी, उसने वह काम [ इतनी शीघ्रतासे कर डाला कि ] मानो पहलेसे ही कर रखा था। राजा ब्राह्मण, साधु और देवताओंको पूज रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजीके लिये सब मङ्गलकार्य कर रहे हैं॥ १ ॥
सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा॥ राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए॥२॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेककी सुहावनी खबर सुनते ही अवधभरमें बड़ी धूमसे बधावे बजने लगे। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके शरीरमें भी शुभ शकुन सूचित हुए। उनके सुन्दर मङ्गल अङ्ग फड़कने लगे॥ २ ॥
पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं॥ भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी॥३॥
भावार्थ
पुलकित होकर वे दोनों प्रेमसहित एक-दूसरेसे कहते हैं कि ये सब शकुन भरतके आनेकी सूचना देनेवाले हैं। [ उनको मामाके घर गये ] बहुत दिन हो गये; बहुत ही अवसेर आ रही है ( बार-बार उनसे मिलनेकी मनमें आती है ) शकुनोंसे प्रिय ( भरत )-के मिलनेका विश्वास होता है॥ ३ ॥
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं॥ रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भाँती॥४॥
भावार्थ
और भरतके समान जगत्में [ हमें ] कौन प्यारा है! शकुनका बस, यही फल है, दूसरा नहीं। श्रीरामचन्द्रजीको [ अपने ] भाई भरतका दिन-रात ऐसा सोच रहता है जैसा कछुएका हृदय अंडोंमें रहता है॥ ४॥
एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु। सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु॥७॥
भावार्थ
इसी समय यह परम मङ्गल समाचार सुनकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा। जैसे चन्द्रमाको बढ़ते देखकर समुद्रमें लहरोंका विलास ( आनन्द ) सुशोभित होता है॥ ७ ॥
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