दोहा 6
हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी॥ औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना॥१॥
भावार्थ
मुनिराजने हर्षित होकर कोमल वाणीसे कहा कि सम्पूर्ण श्रेष्ठ तीर्थोंका जल ले आओ। फिर उन्होंने ओषधि, मूल, फूल, फल और पत्र आदि अनेकों माङ्गलिक वस्तुओंके नाम गिनकर बताये॥ १ ॥
चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती॥ मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका॥२॥
भावार्थ
चँवर, मृगचर्म, बहुत प्रकारके वस्त्र, असंख्यों जातियोंके ऊनी और रेशमी कपड़े, [ नाना प्रकारकी ] मणियाँ ( रत्न ) तथा और भी बहुत-सी मङ्गल वस्तुएँ, जो जगत्में राज्याभिषेकके योग्य होती हैं [ सबको मँगानेकी उन्होंने आज्ञा दी ]॥ २ ॥
बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना॥ सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा॥३॥
भावार्थ
मुनिने वेदोंमें कहा हुआ सब विधान बताकर कहा—नगरमें बहुत-से मण्डप ( चँदोवे ) सजाओ। फलोंसमेत आम, सुपारी और केलेके वृक्ष नगरकी गलियोंमें चारों ओर रोप दो॥ ३ ॥
रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू॥ पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा॥४॥
भावार्थ
सुन्दर मणियोंके मनोहर चौक पुरवाओ और बाजारको तुरंत सजानेके लिये कह दो। श्रीगणेशजी, गुरु और कुलदेवताकी पूजा करो और भूदेव ब्राह्मणोंकी सब प्रकारसे सेवा करो॥ ४ ॥
ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग। सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग॥६॥
भावार्थ
ध्वजा, पताका, तोरण, कलश, घोड़े, रथ और हाथी सबको सजाओ। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीके वचनोंको शिरोधार्य करके सब लोग अपने-अपने काममें लग गये॥ ६ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें