दोहा 9
तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए॥ गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा॥१॥
भावार्थ
तब राजाने वसिष्ठजीको बुलाया और शिक्षा ( समयोचित उपदेश ) देनेके लिये श्रीरामचन्द्रजीके महलमें भेजा। गुरुका आगमन सुनते ही श्रीरघुनाथजीने दरवाजेपर आकर उनके चरणोंमें मस्तक नवाया॥१॥
सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने॥ गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी॥२॥
भावार्थ
आदरपूर्वक अर्घ्य देकर उन्हें घरमें लाये और षोडशोपचारसे पूजा करके उनका सम्मान किया। फिर सीताजीसहित उनके चरण स्पर्श किये और कमलके समान दोनों हाथोंको जोड़कर श्रीरामजी बोले—॥२॥
सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू॥ तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती॥३॥
भावार्थ
यद्यपि सेवकके घर स्वामीका पधारना मङ्गलोंका मूल और अमङ्गलोंका नाश करनेवाला होता है, तथापि हे नाथ! उचित तो यही था कि प्रेमपूर्वक दासको ही कार्यके लिये बुला भेजते; ऐसी ही नीति है॥३॥
प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू॥ आयसु होइ सो करौं गोसाईं। सेवकु लहइ स्वामि सेवकाईं॥४॥
भावार्थ
परन्तु प्रभु ( आप )-ने प्रभुता छोड़कर ( स्वयं यहाँ पधारकर ) जो स्नेह किया, इससे आज यह घर पवित्र हो गया। हे गोसाईं! [ अब ] जो आज्ञा हो, मैं वही करूँ। स्वामीकी सेवामें ही सेवकका लाभ है॥४॥
सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस। राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस॥९॥
भावार्थ
[ श्रीरामचन्द्रजीके ] प्रेममें सने हुए वचनोंको सुनकर मुनि वसिष्ठजीने श्रीरघुनाथजीकी प्रशंसा करते हुए कहा कि हे राम! भला, आप ऐसा क्यों न कहें। आप सूर्यवंशके भूषण जो हैं॥९॥
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