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दोहा 72

चौ०

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं॥ नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी॥१॥

भावार्थ

हे स्वामी! आपने मुझे सीख तो बड़ी अच्छी दी है, पर मुझे अपनी कायरतासे वह मेरे लिये अगम ( पहुँचके बाहर ) लगी। शास्त्र और नीतिके तो वे ही श्रेष्ठ पुरुष अधिकारी हैं जो धीर हैं और धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हैं॥ १॥

चौ०

मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला॥ गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू॥२॥

भावार्थ

मैं तो प्रभु ( आप ) के स्नेहमें पला हुआ छोटा बच्चा हूँ! कहीं हंस भी मन्दराचल या सुमेरु पर्वतको उठा सकते हैं! हे नाथ! स्वभावसे ही कहता हूँ, आप विश्वास करें, मैं आपको छोड़कर गुरु, पिता, माता किसीको भी नहीं जानता॥ २॥

चौ०

जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई॥ मोरे सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी॥३॥

भावार्थ

जगत्‌में जहाँतक स्नेहका सम्बन्ध, प्रेम और विश्वास है, जिनको स्वयं वेदने गाया है—हे स्वामी! हे दीनबन्धु! हे सबके हृदयके अंदरकी जाननेवाले! मेरे तो वे सब कुछ केवल आप ही हैं॥ ३॥

चौ०

धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही॥ मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई॥४॥

भावार्थ

धर्म और नीतिका उपदेश तो उसको करना चाहिये जिसे कीर्ति, विभूति ( ऐश्वर्य ) या सद्गति प्यारी हो। किन्तु जो मन, वचन और कर्मसे चरणोंमें ही प्रेम रखता हो, हे कृपासिन्धु! क्या वह भी त्यागनेके योग्य है?॥ ४॥

दो०

करुनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन बिनीत। समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत॥७२॥

भावार्थ

दयाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने भले भाईके कोमल और नम्रतायुक्त वचन सुनकर और उन्हें स्नेहके कारण डरे हुए जानकर, हृदयसे लगाकर समझाया॥ ७२॥

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