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दोहा 73

श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद

चौ०

मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई॥ मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी॥१॥

भावार्थ

[ और कहा— ] हे भाई! जाकर मातासे विदा माँग आओ और जल्दी वनको चलो! रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीकी वाणी सुनकर लक्ष्मणजी आनन्दित हो गये। बड़ी हानि दूर हो गयी और बड़ा लाभ हुआ!॥ १ ॥

चौ०

हरषित हृदयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए॥ जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा॥२॥

भावार्थ

वे हर्षित हृदयसे माता सुमित्राजीके पास आये, मानो अंधा फिरसे नेत्र पा गया हो। उन्होंने जाकर माताके चरणोंमें मस्तक नवाया। किन्तु उनका मन रघुकुलको आनन्द देनेवाले श्रीरामजी और जानकीजीके साथ था॥ २ ॥

चौ०

पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी॥ गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा॥३॥

भावार्थ

माताने उदास मन देखकर उनसे [ कारण ] पूछा। लक्ष्मणजीने सब कथा विस्तारसे कह सुनायी। सुमित्राजी कठोर वचनोंको सुनकर ऐसी सहम गयीं जैसे हिरनी चारों ओर वनमें आग लगी देखकर सहम जाती है॥ ३ ॥

चौ०

लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू॥ मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाहीं॥४॥

भावार्थ

लक्ष्मणने देखा कि आज ( अब ) अनर्थ हुआ। ये स्नेहवश काम बिगाड़ देंगी! इसलिये वे विदा माँगते हुए डरके मारे सकुचाते हैं [ और मन-ही-मन सोचते हैं ] कि हे विधाता! माता साथ जानेको कहेंगी या नहीं॥ ४॥

दो०

समुझि सुमित्राँ राम सिय रूपु सुसीलु सुभाउ। नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ॥७३॥

भावार्थ

सुमित्राजीने श्रीरामजी और श्रीसीताजीके रूप, सुन्दर शील और स्वभावको समझकर और उनपर राजाका प्रेम देखकर अपना सिर धुना ( पीटा ) और कहा कि पापिनी कैकेयीने बुरी तरह घात लगाया॥ ७३ ॥

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