दोहा 71
अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई॥ भवन भरतु रिपुसूदनु नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं॥१॥
भावार्थ
हे भाई! हृदयमें ऐसा जानकर मेरी सीख सुनो और माता-पिताके चरणोंकी सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न घरपर नहीं हैं, महाराज वृद्ध हैं और उनके मनमें मेरा दुःख है॥ १॥
मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा॥ गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू॥२॥
भावार्थ
इस अवस्थामें मैं तुमको साथ लेकर वन जाऊँ तो अयोध्या सभी प्रकारसे अनाथ हो जायगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार सभीपर दुःखका दुःसह भार आ पड़ेगा॥ २॥
रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू॥ जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥३॥
भावार्थ
अतः तुम यहीं रहो और सबका सन्तोष करते रहो। नहीं तो हे तात! बड़ा दोष होगा। जिसके राज्यमें प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरकका अधिकारी होता है॥ ३॥
रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी॥ सिअरें बचन सूखि गए कैसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें॥४॥
भावार्थ
हे तात! ऐसी नीति विचारकर तुम घर रह जाओ। यह सुनते ही लक्ष्मणजी बहुत ही व्याकुल हो गये। इन शीतल वचनोंसे वे कैसे सूख गये, जैसे पालेके स्पर्शसे कमल सूख जाता है!॥ ४॥
उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ। नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ॥७१॥
भावार्थ
प्रेमवश लक्ष्मणजीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता। उन्होंने व्याकुल होकर श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये और कहा—हे नाथ! मैं दास हूँ और आप स्वामी हैं; अतः आप मुझे छोड़ ही दें तो मेरा क्या वश है?॥ ७१॥
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