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दोहा 67

चौ०

मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी॥ सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं॥१॥

भावार्थ

क्षण-क्षणमें आपके चरणकमलोंको देखते रहनेसे मुझे मार्ग चलनेमें थकावट न होगी। हे प्रियतम! मैं सभी प्रकारसे आपकी सेवा करूँगी और मार्ग चलनेसे होनेवाली सारी थकावटको दूर कर दूँगी॥ १॥

चौ०

पाय पखारि बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं॥ श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें॥२॥

भावार्थ

आपके पैर धोकर, पेड़ोंकी छायामें बैठकर, मनमें प्रसन्न होकर हवा करूँगी ( पंखा झलूँगी )। पसीनेकी बूँदोंसहित श्याम शरीरको देखकर—प्राणपतिके दर्शन करते हुए दुःखके लिये मुझे अवकाश ही कहाँ रहेगा॥ २॥

चौ०

सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाय पलोटिहि सब निसि दासी॥ बार बार मृदु मूरति जोही। लागिहि तात बयारि न मोही॥३॥

भावार्थ

समतल भूमिपर घास और पेड़ोंके पत्ते बिछाकर यह दासी रातभर आपके चरण दबावेगी। बार-बार आपकी कोमल मूर्तिको देखकर मुझको गरम हवा भी न लगेगी॥ ३॥

चौ०

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा॥ मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू॥४॥

भावार्थ

प्रभुके साथ [ रहते ] मेरी ओर [ आँख उठाकर ] देखनेवाला कौन है ( अर्थात्‌ कोई नहीं देख सकता )! जैसे सिंहकी स्त्री ( सिंहनी ) को खरगोश और सियार नहीं देख सकते। मैं सुकुमारी हूँ और नाथ वनके योग्य हैं? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय-भोग?॥ ४॥

दो०

ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न हृदउ बिलगान। तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान॥६७॥

भावार्थ

ऐसे कठोर वचन सुनकर भी जब मेरा हृदय न फटा तो, हे प्रभु! [ मालूम होता है ] ये पामर प्राण आपके वियोगका भीषण दुःख सहेंगे॥ ६७॥

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