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दोहा 68

श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद

चौ०

अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी॥ देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना॥१॥

भावार्थ

ऐसा कहकर सीताजी बहुत ही व्याकुल हो गयीं। वे वचनके वियोगको भी न सँभाल सकीं ( अर्थात्‌ शरीरसे वियोगकी बात तो अलग रही, वचनसे भी वियोगकी बात सुनकर वे अत्यन्त विकल हो गयीं )। उनकी यह दशा देखकर श्रीरघुनाथजीने अपने जीमें जान लिया कि हठपूर्वक इन्हें यहाँ रखनेसे ये प्राणोंको न रखेंगी॥ १॥

चौ०

कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा॥ नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू॥२॥

भावार्थ

तब कृपालु, सूर्यकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि सोच छोड़कर मेरे साथ वनको चलो। आज विषाद करनेका अवसर नहीं है। तुरंत वनगमनकी तैयारी करो॥ २॥

चौ०

कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई॥ बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई॥३॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीने प्रिय वचन कहकर प्रियतमा सीताजीको समझाया। फिर माताके पैरों लगकर आशीर्वाद प्राप्त किया। [ माताने कहा— ] बेटा! जल्दी लौटकर प्रजाके दुःखको मिटाना और यह निठुर माता तुम्हें भूल न जाय!॥ ३॥

चौ०

फिरिहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी॥ सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि॥४॥

भावार्थ

हे विधाता! क्या मेरी दशा भी फिर पलटेगी? क्या अपने नेत्रोंसे मैं इस मनोहर जोड़ीको फिर देख पाऊँगी? हे पुत्र! वह सुन्दर दिन और शुभ घड़ी कब होगी जब तुम्हारी जननी जीते-जी तुम्हारा चाँद-सा मुखड़ा फिर देखेगी!॥ ४॥

दो०

बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात। कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात॥६८॥

भावार्थ

हे तात! ‘वत्स’ कहकर, ‘लाल’ कहकर, ‘रघुपति’ कहकर, ‘रघुवर’ कहकर, मैं फिर कब तुम्हें बुलाकर हृदयसे लगाऊँगी और हर्षित होकर तुम्हारे अङ्गोंको देखूँगी!॥ ६८॥

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