दोहा 66
श्रीराम-कौसल्या-सीता-संवाद
बनदेबीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा॥ कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई॥१॥
भावार्थ
उदार हृदयके वनदेवी और वनदेवता ही सास-ससुरके समान मेरी सार-सँभार करेंगे, और कुशा और पत्तोंकी सुन्दर साथरी ( बिछौना ) ही प्रभुके साथ कामदेवकी मनोहर तोशकके समान होगी॥ १ ॥
कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू॥ छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकी। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी॥२॥
भावार्थ
कन्द, मूल और फल ही अमृतके समान आहार होंगे और [ वनके ] पहाड़ ही अयोध्याके सैकड़ों राजमहलोंके समान होंगे। क्षण-क्षणमें प्रभुके चरणकमलोंको देख-देखकर मैं ऐसी आनन्दित रहूँगी जैसी दिनमें चकवी रहती है॥ २ ॥
बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे॥ प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना॥३॥
भावार्थ
हे नाथ! आपने वनके बहुत-से दुःख और बहुत-से भय, विषाद और सन्ताप कहे। परन्तु हे कृपानिधान! वे सब मिलकर भी प्रभु ( आप ) के वियोग [ से होनेवाले दुःख ] के लवलेशके समान भी नहीं हो सकते॥ ३ ॥
अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि॥ बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी॥४॥
भावार्थ
ऐसा जीमें जानकर, हे सुजानशिरोमणि! आप मुझे साथ ले लीजिये, यहाँ न छोड़िये। हे स्वामी! मैं अधिक क्या विनती करूँ? आप करुणामय हैं और सबके हृदयके अंदरकी जाननेवाले हैं॥ ४॥
राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान। दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान॥६६॥
भावार्थ
हे दीनबन्धु! हे सुन्दर! हे सुख देनेवाले! हे शील और प्रेमके भण्डार! यदि अवधि ( चौदह वर्ष ) तक मुझे अयोध्यामें रखते हैं तो जान लीजिये कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे॥ ६६॥
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