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दोहा 32

चौ०

राम सपथ सत कहउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ॥ मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें॥१॥

भावार्थ

रामकी सौ बार सौगंध खाकर मैं स्वभावसे ही कहता हूँ कि रामकी माता ( कौसल्या ) ने [ इस विषयमें ] मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। अवश्य ही मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया। इसीसे मेरा मनोरथ खाली गया॥१॥

चौ०

रिस परिहरु अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू॥ एकहि बात मोंहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा॥२॥

भावार्थ

अब क्रोध छोड़ दे और मङ्गल साज सज। कुछ ही दिनों बाद भरत युवराज हो जायँगे। एक ही बातका मुझे दुःख लगा कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड़चनका माँगा॥२॥

चौ०

अजहूँ हृदउ जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा॥ कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू॥३॥

भावार्थ

उसकी आँचसे अब भी मेरा हृदय जल रहा है। यह दिल्लगीमें, क्रोधमें अथवा सचमुच ही ( वास्तवमें ) सच्चा है? क्रोधको त्यागकर रामका अपराध तो बता। सब कोई तो कहते हैं कि राम बड़े ही साधु हैं॥३॥

चौ०

तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू॥ जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला॥४॥

भावार्थ

तू स्वयं भी रामकी सराहना करती और उनपर स्नेह किया करती थी। अब यह सुनकर मुझे सन्देह हो गया है [ कि तुम्हारी प्रशंसा और स्नेह कहीं झूठे तो न थे? ] जिसका स्वभाव शत्रुको भी अनुकूल है, वह माताके प्रतिकूल आचरण क्योंकर करेगा?॥४॥

दो०

प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु। जेहिं देखौं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु॥३२॥

भावार्थ

हे प्रिये! हँसी और क्रोध छोड़ दे और विवेक ( उचित-अनुचित ) विचारकर वर माँग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरतका राज्याभिषेक देख सकूँ॥३२॥

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