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दोहा 31

चौ०

आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥ मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई॥१॥

भावार्थ

प्रचण्ड क्रोधसे जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखायी पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार नंगी ( म्यानसे बाहर ) खड़ी हो। कुबुद्धि उस तलवारकी मूठ है, निष्ठुरता धार है और वह कुबरी ( मन्थरा ) रूपी सानपर धरकर तेज की हुई है॥१॥

चौ०

लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा॥ बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती॥२॥

भावार्थ

राजाने देखा कि यह ( तलवार ) बड़ी ही भयानक और कठोर है [ और सोचा— ] क्या सत्य ही यह मेरा जीवन लेगी? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रताके साथ उसे ( कैकेयीको ) प्रिय लगनेवाली वाणी बोले— ॥२॥

चौ०

प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥ मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरु साखी॥३॥

भावार्थ

हे प्रिये! हे भीरु! विश्वास और प्रेमको नष्ट करके ऐसे बुरी तरहके वचन कैसे कह रही हो। मेरे तो भरत और रामचन्द्र दो आँखें ( अर्थात्‌ एक-से ) हैं; यह मैं शङ्करजीकी साक्षी देकर सत्य कहता हूँ॥३॥

चौ०

अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता॥ सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई॥४॥

भावार्थ

मैं अवश्य सबेरे ही दूत भेजूँगा। दोनों भाई ( भरत-शत्रुघ्न ) सुनते ही तुरंत आ जायँगे। अच्छा दिन ( शुभ मुहूर्त्त ) शोधवाकर, सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरतको राज्य दे दूँगा॥४॥

दो०

लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति। मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति॥३१॥

भावार्थ

रामको राज्यका लोभ नहीं है और भरतपर उनका बड़ा ही प्रेम है। मैं ही अपने मनमें बड़े-छोटेका विचार करके राजनीतिका पालन कर रहा था ( बड़ेको राजतिलक देने जा रहा था )॥३१॥

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