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दोहा 30

चौ०

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा॥ भरतु कि राउर पूत न होंही। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही॥१॥

भावार्थ

इस प्रकार राजा मन-ही-मन झींख रहे हैं। राजाका ऐसा बुरा हाल देखकर दुर्बुद्धि कैकेयी मनमें बुरी तरहसे क्रोधित हुई। [ और बोली— ] क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं? क्या मुझे आप दाम देकर खरीद लाये हैं? ( क्या मैं आपकी विवाहिता पत्नी नहीं हूँ? )॥ १ ॥

चौ०

जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारें॥ देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं॥२॥

भावार्थ

जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिये—हाँ कीजिये, नहीं तो ‘नाहीं’ कर दीजिये। आप रघुवंशमें सत्य प्रतिज्ञावाले [ प्रसिद्ध ] हैं!॥ २ ॥

चौ०

देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहु सत्य जग अपजसु लेहू॥ सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना॥३॥

भावार्थ

आपने ही वर देनेको कहा था, अब भले ही न दीजिये। सत्यको छोड़ दीजिये और जगत्‌में अपयश लीजिये। सत्यकी बड़ी सराहना करके वर देनेको कहा था। समझा था कि यह चबेना ही माँग लेगी!॥ ३ ॥

चौ०

सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥ अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई॥४॥

भावार्थ

राजा शिबि, दधीचि और बलिने जो कुछ कहा, शरीर और धन त्यागकर भी उन्होंने अपने वचनकी प्रतिज्ञाको निबाहा। कैकेयी बहुत ही कड़ुवे वचन कह रही है, मानो जलेपर नमक छिड़क रही हो॥ ४ ॥

दो०

धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ। सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ॥३०॥

भावार्थ

धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले राजा दशरथने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लंबी साँस लेकर इस प्रकार कहा कि इसने मुझे बड़े कुठौर मारा ( ऐसी कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे बच निकलना कठिन हो गया )॥३०॥

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