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दोहा 33

चौ०

जिऐ मीन बरु बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना॥ कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥१॥

भावार्थ

मछली चाहे बिना पानीके जीती रहे और साँप भी चाहे बिना मणिके दीन-दुखी होकर जीता रहे। परन्तु मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, मनमें [ जरा भी ] छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन रामके बिना नहीं है॥१॥

चौ०

समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना॥ सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई॥२॥

भावार्थ

हे चतुर प्रिये! जीमें समझ देख, मेरा जीवन श्रीरामके दर्शनके अधीन है। राजाके कोमल वचन सुनकर दुर्बुद्धि कैकेयी अत्यन्त जल रही है। मानो अग्निमें घीकी आहुतियाँ पड़ रही हैं॥२॥

चौ०

कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया॥ देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं॥३॥

भावार्थ

[ कैकेयी कहती है— ] आप करोड़ों उपाय क्यों न करें, यहाँ आपकी माया ( चालबाजी ) नहीं लगेगी। या तो मैंने जो माँगा है सो दीजिये, नहीं तो ‘नाहीं’ करके अपयश लीजिये। मुझे बहुत प्रपञ्च ( बखेड़े ) नहीं सुहाते॥३॥

चौ०

रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने॥ जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका॥४॥

भावार्थ

राम साधु हैं, आप सयाने साधु हैं और रामकी माता भी भली हैं; मैंने सबको पहचान लिया है। कौसल्याने मेरा जैसा भला चाहा है, मैं भी साका करके ( याद रखनेयोग्य ) उन्हें वैसा ही फल दूँगी॥४॥

दो०

होत प्रातु मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं। मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं॥३३॥

भावार्थ

सबेरा होते ही मुनिका वेष धारणकर यदि राम वनको नहीं जाते, तो हे राजन्‌! मनमें [ निश्चय ] समझ लीजिये कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश!॥३३॥

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