दोहा 306
सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा॥ मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू॥१॥
भावार्थ
गुरुजीका प्रसाद ( अनुग्रह ) ही घरमें और वनमें समाजसहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है। माता, पिता, गुरु और स्वामीकी आज्ञा [ का पालन ] समस्त धर्मरूपी पृथ्वीको धारण करनेमें शेषजीके समान है॥१॥
सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू॥ साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी॥२॥
भावार्थ
हे तात! तुम वही करो और मुझसे भी कराओ तथा सूर्यकुलके रक्षक बनो। साधकके लिये यह एक ही ( आज्ञापालनरूपी साधना ) सम्पूर्ण सिद्धियोंकी देनेवाली, कीर्तिमयी, सद्गतिमयी और ऐश्वर्यमयी त्रिवेणी है॥२॥
सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी॥ बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई॥३॥
भावार्थ
इसे विचारकर भारी संकट सहकर भी प्रजा और परिवारको सुखी करो। हे भाई! मेरी विपत्ति सभीने बाँट ली है, परन्तु तुमको तो अवधि ( चौदह वर्ष )-तक बड़ी कठिनाई है ( सबसे अधिक दुःख है )॥३॥
जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा॥ होहिं कुठायँ सुबंधु सहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए॥४॥
भावार्थ
तुमको कोमल जानकर भी मैं कठोर ( वियोगकी बात ) कह रहा हूँ। हे तात! बुरे समयमें मेरे लिये यह कोई अनुचित बात नहीं है। कुठौर ( कुअवसर ) में श्रेष्ठ भाई ही सहायक होते हैं। वज्रके आघात भी हाथसे ही रोके जाते हैं॥४॥
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ। तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ॥३०६॥
भावार्थ
सेवक हाथ, पैर और नेत्रोंके समान और स्वामी मुखके समान होना चाहिये। तुलसीदासजी कहते हैं कि सेवक-स्वामीकी ऐसी प्रीतिकी रीति सुनकर सुकवि उसकी सराहना करते हैं॥३०६॥
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