दोहा 305
जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती॥ समउ समाजु लाज गुरजन की। उदासीन हित अनहित मन की॥१॥
भावार्थ
हे तात! तुम सूर्यकुलकी रीतिको, सत्यप्रतिज्ञ पिताजीकी कीर्ति और प्रीतिको, समय, समाज और गुरुजनोंकी लज्जा ( मर्यादा ) को तथा उदासीन, मित्र और शत्रु सबके मनकी बातको जानते हो॥१॥
तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू॥ मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा॥२॥
भावार्थ
तुमको सबके कर्मों ( कर्तव्यों ) का और अपने तथा मेरे परम हितकारी धर्मका पता है। यद्यपि मुझे तुम्हारा सब प्रकारसे भरोसा है, तथापि मैं समयके अनुसार कुछ कहता हूँ॥२॥
तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरकुल कृपाँ संँभारी॥ नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू॥३॥
भावार्थ
हे तात! पिताजीके बिना ( उनकी अनुपस्थितिमें ) हमारी बात केवल गुरुवंशकी कृपाने ही सम्हाल रखी है; नहीं तो हमारे समेत प्रजा, कुटुम्ब, परिवार सभी बर्बाद हो जाते॥३॥
जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥ तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा॥४॥
भावार्थ
यदि बिना समयके ( संध्यासे पूर्व ही ) सूर्य अस्त हो जाय तो कहो जगत्में किसको क्लेश न होगा? हे तात! उसी प्रकारका उत्पात विधाताने यह ( पिताकी असामयिक मृत्यु ) किया है। पर मुनि महाराजने तथा मिथिलेश्वरने सबको बचा लिया॥४॥
राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम। गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम॥३०५॥
भावार्थ
राज्यका सब कार्य, लज्जा, प्रतिष्ठा, धर्म, पृथ्वी, धन, घर—इन सभीका पालन ( रक्षण ) गुरुजीका प्रभाव ( सामर्थ्य ) करेगा और परिणाम शुभ होगा॥३०५॥
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