दोहा 307
सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअँ जनु सानी॥ सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी॥१॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीकी वाणी सुनकर, जो मानो प्रेमरूपी समुद्रके [ मन्थनसे निकले हुए ] अमृतमें सनी हुई थी, सारा समाज शिथिल हो गया; सबको प्रेमसमाधि लग गयी। यह दशा देखकर सरस्वतीने चुप साध ली॥१॥
भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू॥ मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥२॥
भावार्थ
भरतजीको परम सन्तोष हुआ। स्वामीके सम्मुख ( अनुकूल ) होते ही उनके दुःख और दोषोंने मुँह मोड़ लिया ( वे उन्हें छोड़कर भाग गये )। उनका मुख प्रसन्न हो गया और मनका विषाद मिट गया। मानो गूँगेपर सरस्वतीकी कृपा हो गयी हो॥२॥
कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी॥ नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को॥३॥
भावार्थ
उन्होंने फिर प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और करकमलोंको जोड़कर वे बोले—हे नाथ! मुझे आपके साथ जानेका सुख प्राप्त हो गया और मैंने जगत्में जन्म लेनेका लाभ भी पा लिया॥३॥
अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई॥ सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई॥४॥
भावार्थ
हे कृपालु! अब जैसी आज्ञा हो, उसीको मैं सिरपर धरकर आदरपूर्वक करूँ! परन्तु देव! आप मुझे वह अवलम्बन ( कोई सहारा ) दें जिसकी सेवा कर मैं अवधिका पार पा जाऊँ ( अवधिको बिता दूँ )॥४॥
देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ। आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ॥३०७॥
भावार्थ
हे देव! स्वामी ( आप ) के अभिषेकके लिये गुरुजीकी आज्ञा पाकर मैं सब तीर्थोंका जल लेता आया हूँ; उसके लिये क्या आज्ञा होती है?॥३०७॥
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