दोहा 232
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई॥ गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी॥१॥
भावार्थ
अन्धकार चाहे तरुण ( मध्याह्नके ) सूर्यको निगल जाय। आकाश चाहे बादलोंमें समाकर मिल जाय। गौके खुर-इतने जलमें अगस्त्यजी डूब जायँ और पृथ्वी चाहे अपनी स्वाभाविक क्षमा ( सहनशीलता ) को छोड़ दे॥१॥
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥ लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥२॥
भावार्थ
मच्छरकी फूँकसे चाहे सुमेरु उड़ जाय। परन्तु हे भाई! भरतको राजमद कभी नहीं हो सकता। हे लक्ष्मण! मैं तुम्हारी शपथ और पिताजीकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ, भरतके समान पवित्र और उत्तम भाई संसारमें नहीं है॥२॥
सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥ भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥३॥
भावार्थ
हे तात! गुणरूपी दूध और अवगुणरूपी जलको मिलाकर विधाता इस दृश्य-प्रपञ्च ( जगत् )को रचता है। परन्तु भरतने सूर्यवंशरूपी तालाबमें हंसरूप जन्म लेकर गुण और दोषका विभाग कर दिया ( दोनोंको अलग-अलग कर दिया )॥३॥
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी॥ कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ॥४॥
भावार्थ
गुणरूपी दूधको ग्रहणकर और अवगुणरूपी जलको त्यागकर भरतने अपने यशसे जगत्में उजियाला कर दिया है। भरतजीके गुण, शील और स्वभावको कहते-कहते श्रीरघुनाथजी प्रेमसमुद्रमें मग्न हो गये॥४॥
सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु। सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु॥२३२॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी वाणी सुनकर और भरतजीपर उनका प्रेम देखकर समस्त देवता उनकी सराहना करने लगे [ और कहने लगे ] कि श्रीरामचन्द्रजीके समान कृपाके धाम प्रभु और कौन हैं?॥२३२॥
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