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दोहा 233

भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध

चौ०

जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को॥ कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा॥१॥

भावार्थ

यदि जगत्‌में भरतका जन्म न होता, तो पृथ्वीपर सम्पूर्ण धर्मोंकी धुरीको कौन धारण करता? हे रघुनाथजी! कविकुलके लिये अगम ( उनकी कल्पनासे अतीत ) भरतजीके गुणोंकी कथा आपके सिवा और कौन जान सकता है?॥१॥

चौ०

लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी॥ इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए॥२॥

भावार्थ

लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने देवताओंकी वाणी सुनकर अत्यन्त सुख पाया, जो वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ भरतजीने सारे समाजके साथ पवित्र मन्दाकिनीमें स्नान किया॥२॥

चौ०

सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा॥ चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई॥३॥

भावार्थ

फिर सबको नदीके समीप ठहराकर तथा माता, गुरु और मन्त्रीकी आज्ञा माँगकर निषादराज और शत्रुघ्नको साथ लेकर भरतजी वहाँको चले जहाँ श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी थे॥३॥

चौ०

समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं॥ रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ॥४॥

भावार्थ

भरतजी अपनी माता कैकेयीकी करनीको समझकर ( याद करके ) सकुचाते हैं और मनमें करोड़ों ( अनेकों ) कुतर्क करते हैं [ सोचते हैं— ] श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी मेरा नाम सुनकर स्थान छोड़कर कहीं दूसरी जगह उठकर न चले जायँ॥४॥

दो०

मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर। अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर॥२३३॥

भावार्थ

मुझे माताके मतमें मानकर वे जो कुछ भी करें सो थोड़ा है, पर वे अपनी ओर समझकर ( अपने विरद और सम्बन्धको देखकर ) मेरे पापों और अवगुणोंको क्षमा करके मेरा आदर ही करेंगे॥२३३॥

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