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दोहा 231

श्रीरामजीका लक्ष्मणजीको समझाना एवं भरतजीकी महिमा कहना

चौ०

जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी॥ तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा॥१॥

भावार्थ

सारा जगत्‌ भयमें डूब गया। तब लक्ष्मणजीके अपार बाहुबलकी प्रशंसा करती हुई आकाशवाणी हुई—हे तात ! तुम्हारे प्रताप और प्रभावको कौन कह सकता है और कौन जान सकता है?॥१॥

चौ०

अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ॥ सहसा करि पाछें पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं॥२॥

भावार्थ

परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा कहते हैं। वेद और विद्वान्‌ कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दीमें किसी कामको करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान्‌ नहीं हैं॥२॥

चौ०

सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने॥ कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई॥३॥

भावार्थ

देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गये। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने उनका आदरके साथ सम्मान किया [ और कहा— ] हे तात! तुमने बड़ी सुन्दर नीति कही। हे भाई! राज्यका मद सबसे कठिन मद है॥३॥

चौ०

जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई॥ सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा॥४॥

भावार्थ

जिन्होंने साधुओंकी सभाका सेवन ( सत्सङ्ग ) नहीं किया, वे ही राजा राजमदरूपी मदिराका आचमन करते ही ( पीते ही ) मतवाले हो जाते हैं। हे लक्ष्मण ! सुनो, भरत-सरीखा उत्तम पुरुष ब्रह्माकी सृष्टिमें न तो कहीं सुना गया है, न देखा ही गया है॥४॥

दो०

भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ। कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ॥२३१॥

भावार्थ

[ अयोध्याके राज्यकी तो बात ही क्या है ] ब्रह्मा, विष्णु और महादेवका पद पाकर भी भरतको राज्यका मद नहीं होनेका! क्या कभी काँजीकी बूँदोंसे क्षीरसमुद्र नष्ट हो सकता ( फट सकता ) है?॥२३१॥

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