दोहा 199
कुस साँथरी निहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई॥ चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई॥१॥
भावार्थ
कुशोंकी सुन्दर साथरी देखकर उसकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम किया। श्रीरामचन्द्रजीके चरण-चिह्नोंकी रज आँखोंमें लगायी। [ उस समयके ] प्रेमकी अधिकता कहते नहीं बनती॥ १ ॥
कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे॥ सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी॥२॥
भावार्थ
भरतजीने दो-चार स्वर्णविन्दु ( सोनेके कण या तारे आदि जो सीताजीके गहने-कपड़ोंसे गिर पड़े थे ) देखे तो उनको सीताजीके समान समझकर सिरपर रख लिया। उनके नेत्र [ प्रेमाश्रुके ] जलसे भरे हैं और हृदयमें ग्लानि भरी है। वे सखासे सुन्दर वाणीमें ये वचन बोले—॥ २ ॥
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना॥ पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही॥३॥
भावार्थ
ये स्वर्णके कण या तारे भी सीताजीके विरहसे ऐसे श्रीहत ( शोभाहीन ) एवं कान्तिहीन हो रहे हैं, जैसे [ रामवियोगमें ] अयोध्याके नर-नारी विलीन ( शोकके कारण क्षीण ) हो रहे हैं। जिन सीताजीके पिता राजा जनक हैं, इस जगत्में भोग और योग दोनों ही जिनकी मुट्ठीमें हैं, उन जनकजीको मैं किसकी उपमा दूँ ?॥३॥
ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू॥ प्राननाथु रघुनाथ गोसाईं। जो बड़ होत सो राम बड़ाईं॥४॥
भावार्थ
सूर्यकुलके सूर्य राजा दशरथजी जिनके ससुर हैं, जिनको अमरावतीके स्वामी इन्द्र भी सिहाते थे ( ईर्ष्यापूर्वक उनके-जैसा ऐश्वर्य और प्रताप पाना चाहते थे ); और प्रभु श्रीरघुनाथजी जिनके प्राणनाथ हैं, जो इतने बड़े हैं कि जो कोई भी बड़ा होता है, वह श्रीरामचन्द्रजीकी [ दी हुई ] बड़ाईसे ही होता है;॥४॥
पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि। बिहरत हृदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि॥१९९॥
भावार्थ
उन श्रेष्ठ पतिव्रता स्त्रियोंमें शिरोमणि सीताजीकी साथरी ( कुशशय्या ) देखकर मेरा हृदय हहराकर ( दहलकर ) फट नहीं जाता; हे शङ्कर! यह वज्रसे भी अधिक कठोर है!॥१९९॥
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