दोहा 200
लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने॥ पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबीरहि प्रानपिआरे॥१॥
भावार्थ
मेरे छोटे भाई लक्ष्मण बहुत ही सुन्दर और प्यार करनेयोग्य हैं। ऐसे भाई न तो किसीके हुए, न हैं, न होनेके ही हैं। जो लक्ष्मण अवधके लोगोंको प्यारे, माता-पिताके दुलारे और श्रीसीतारामजीके प्राणप्यारे हैं;॥१॥
मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ॥ ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती॥२॥
भावार्थ
जिनकी कोमल मूर्ति और सुकुमार स्वभाव है, जिनके शरीरमें कभी गरम हवा भी नहीं लगी, वे वनमें सब प्रकारकी विपत्तियाँ सह रहे हैं। [ हाय! ] इस मेरी छातीने [ कठोरतामें ] करोड़ों वज्रोंका भी निरादर कर दिया [ नहीं तो यह कभीकी फट गयी होती ]॥२॥
राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर॥ पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता॥३॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीने जन्म ( अवतार ) लेकर जगत्को प्रकाशित ( परम सुशोभित ) कर दिया। वे रूप, शील, सुख और समस्त गुणोंके समुद्र हैं। पुरवासी, कुटुम्बी, गुरु, पिता-माता सभीको श्रीरामजीका स्वभाव सुख देनेवाला है॥३॥
बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं॥ सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा॥४॥
भावार्थ
शत्रु भी श्रीरामजीकी बड़ाई करते हैं। बोल-चाल, मिलनेके ढंग और विनयसे वे मनको हर लेते हैं। करोड़ों सरस्वती और अरबों शेषजी भी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहोंकी गिनती नहीं कर सकते॥४॥
सुखस्वरूप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान। ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान॥२००॥
भावार्थ
जो सुख-स्वरूप रघुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी मङ्गल और आनन्दके भण्डार हैं, वे पृथ्वीपर कुशा बिछाकर सोते हैं। विधाताकी गति बड़ी ही बलवान् है॥२००॥
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