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दोहा 198

चौ०

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा॥ सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई॥१॥

भावार्थ

लोगोंने जहाँ-तहाँ डेरा डाल दिया। भरतजीने सभीका पता लगाया [ कि सब लोग आकर आरामसे टिक गये हैं या नहीं ]। फिर देवपूजन करके आज्ञा पाकर दोनों भाई श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीके पास गये॥ १ ॥

चौ०

चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी॥ भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई॥ २ ॥

भावार्थ

चरण दबाकर और कोमल वचन कह-कहकर भरतजीने सब माताओंका सत्कार किया। फिर भाई शत्रुघ्नको माताओंकी सेवा सौंपकर आपने निषादको बुला लिया॥ २ ॥

चौ०

चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीरु सनेह न थोरें॥ पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ॥३॥

भावार्थ

सखा निषादराजके हाथसे हाथ मिलाये हुए भरतजी चले। प्रेम कुछ थोड़ा नहीं है ( अर्थात्‌ बहुत अधिक प्रेम है ), जिससे उनका शरीर शिथिल हो रहा है। भरतजी सखासे पूछते हैं कि मुझे वह स्थान दिखलाओ—और नेत्र और मनकी जलन कुछ ठंडी करो—॥ ३ ॥

चौ०

जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए॥ भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू॥४॥

भावार्थ

जहाँ सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मण रातको सोये थे। ऐसा कहते ही उनके नेत्रोंके कोयोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया। भरतजीके वचन सुनकर निषादको बड़ा विषाद हुआ। वह तुरंत ही उन्हें वहाँ ले गया—॥ ४ ॥

दो०

जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु। अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु॥१९८॥

भावार्थ

जहाँ पवित्र अशोकके वृक्षके नीचे श्रीरामजीने विश्राम किया था। भरतजीने वहाँ अत्यन्त प्रेमसे आदरपूर्वक दण्डवत्-प्रणाम किया ॥ १९८ ॥

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