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दोहा 161

चौ०

बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति॥ तात राउ नहिं सोचै जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू॥१॥

भावार्थ

पुत्रको व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जलेपर नमक लगा रही हो। [ वह बोली— ] हे तात! राजा सोच करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने पुण्य और यश कमाकर उसका पर्याप्त भोग किया॥ १ ॥

चौ०

जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए॥ अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू॥२॥

भावार्थ

जीवनकालमें ही उन्होंने जन्म लेनेके सम्पूर्ण फल पा लिये और अन्तमें वे इन्द्रलोकको चले गये। ऐसा विचारकर सोच छोड़ दो और समाजसहित नगरका राज्य करो॥ २॥

चौ०

सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू॥ धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापिनि सबहि भाँति कुल नासा॥३॥

भावार्थ

राजकुमार भरतजी यह सुनकर बहुत ही सहम गये। मानो पके घावपर अँगार छू गया हो। उन्होंने धीरज धरकर बड़ी लंबी साँस लेते हुए कहा—पापिनी! तूने सभी तरहसे कुलका नाश कर दिया॥ ३ ॥

चौ०

जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही॥ पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा॥४॥

भावार्थ

हाय! यदि तेरी ऐसी ही अत्यन्त बुरी रुचि ( दुष्ट इच्छा ) थी, तो तूने जन्मते ही मुझे मार क्यों नहीं डाला? तूने पेड़को काटकर पत्तेको सींचा है और मछलीके जीनेके लिये पानीको उलीच डाला! ( अर्थात् मेरा हित करने जाकर उलटा तूने मेरा अहित कर डाला )॥ ४॥

दो०

हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ। जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ॥१६१॥

भावार्थ

मुझे सूर्यवंश [ -सा वंश ], दशरथजी [ -सरीखे ] पिता और राम-लक्ष्मण-से भाई मिले। पर हे जननी! मुझे जन्म देनेवाली माता तू हुई! [ क्या किया जाय! ] विधातासे कुछ भी वश नहीं चलता॥ १६१ ॥

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