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दोहा 162

भरत-कौसल्या-संवाद और दशरथजीकी अन्त्येष्टि-क्रिया

चौ०

जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ हृदउ न गयऊ॥ बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा॥१॥

भावार्थ

अरी कुमति! जब तूने हृदयमें यह बुरा विचार ( निश्चय ) ठाना, उसी समय तेरे हृदयके टुकड़े-टुकड़े [ क्यों ] न हो गये ? वरदान माँगते समय तेरे मनमें कुछ भी पीड़ा नहीं हुई ? तेरी जीभ गल नहीं गयी ? तेरे मुँहमें कीड़े नहीं पड़ गये ?॥ १ ॥

चौ०

भूपँ प्रतीति तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही॥ बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी॥२॥

भावार्थ

राजाने तेरा विश्वास कैसे कर लिया ? [ जान पड़ता है, ] विधाताने मरनेके समय उनकी बुद्धि हर ली थी। स्त्रियोंके हृदयकी गति ( चाल ) विधाता भी नहीं जान सके । वह सम्पूर्ण कपट, पाप और अवगुणोंकी खान है॥ २ ॥

चौ०

सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ॥ अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं॥३॥

भावार्थ

फिर राजा तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे। वे भला, स्त्री-स्वभावको कैसे जानते ? अरे, जगत्‌के जीव-जन्तुओंमें ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजी प्राणोंके समान प्यारे नहीं हैं॥ ३ ॥

चौ०

भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही॥ जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहि जाई॥४॥

भावार्थ

वे श्रीरामजी भी तुझे अहित हो गये ( वैरी लगे )! तू कौन है ? मुझे सच-सच कह! तू जो है, सो है, अब मुँहमें स्याही पोतकर ( मुँह काला करके ) उठकर मेरी आँखोंकी ओटमें जा बैठ॥ ४॥

दो०

राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि। मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि॥१६२॥

भावार्थ

विधाताने मुझे श्रीरामजीसे विरोध करनेवाले ( तेरे ) हृदयसे उत्पन्न किया [ अथवा विधाताने मुझे हृदयसे रामका विरोधी जाहिर कर दिया ]। मेरे बराबर पापी दूसरा कौन है ? मैं व्यर्थ ही तुझे कुछ कहता हूँ॥ १६२॥

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