Ramayana.com

दोहा 160

चौ०

तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी॥ कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ॥१॥

भावार्थ

हे तात! मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मन्थरा सहायक हुई। पर विधाताने बीचमें जरा-सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि राजा देवलोकको पधार गये॥१॥

चौ०

सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा॥ तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी॥२॥

भावार्थ

भरत यह सुनते ही विषादके मारे विवश ( बेहाल ) हो गये। मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हाथी सहम गया हो। वे ‘तात! तात! हा तात!’ पुकारते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर जमीनपर गिर पड़े॥ २ ॥

चौ०

चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही॥ बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी॥३॥

भावार्थ

[ और विलाप करने लगे कि ] हे तात! मैं आपको [ स्वर्गके लिये ] चलते समय देख भी न सका। [ हाय! ] आप मुझे श्रीरामजीको सौंप भी नहीं गये! फिर धीरज धरकर वे सँभलकर उठे और बोले—माता! पिताके मरनेका कारण तो बताओ॥ ३ ॥

चौ०

सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई॥ आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी॥४॥

भावार्थ

पुत्रका वचन सुनकर कैकेयी कहने लगी। मानो मर्मस्थानको पाछकर ( चाकूसे चीरकर ) उसमें जहर भर रही हो। कुटिल और कठोर कैकेयीने अपनी सब करनी शुरूसे [ आखीरतक बड़े ] प्रसन्न मनसे सुना दी॥ ४॥

दो०

भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु। हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु॥१६०॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीका वन जाना सुनकर भरतजीको पिताका मरण भूल गया और हृदयमें इस सारे अनर्थका कारण अपनेको ही जानकर वे मौन होकर स्तम्भित रह गये ( अर्थात् उनकी बोली बंद हो गयी और वे सन्न रह गये )॥ १६०॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें