दोहा 159
हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी॥ आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि॥१॥
भावार्थ
बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगरमें दसों दिशाओंमें दावाग्नि लगी है! पुत्रको आते सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके लिये चाँदनीरूपी कैकेयी [ बड़ी ] हर्षित हुई॥१॥
सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई॥ भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा॥२॥
भावार्थ
वह आरती सजाकर आनन्दमें भरकर उठ दौड़ी और दरवाजेपर ही मिलकर भरत-शत्रुघ्नको महलमें ले आयी। भरतने सारे परिवारको दुःखी देखा। मानो कमलोंके वनको पाला मार गया हो॥२॥
कैकेई हरषित एहि भाँती। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती॥ सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें॥३॥
भावार्थ
एक कैकेयी ही इस तरह हर्षित दीखती है मानो भीलनी जंगलमें आग लगाकर आनन्दमें भर रही हो। पुत्रको सोचवश और मनमारे ( बहुत उदास ) देखकर वह पूछने लगी—हमारे नैहरमें कुशल तो है?॥३॥
सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई॥ कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता॥४॥
भावार्थ
भरतजीने सब कुशल कह सुनायी। फिर अपने कुलकी कुशल-क्षेम पूछी। [ भरतजीने कहा— ] कहो, पिताजी कहाँ हैं? मेरी सब माताएँ कहाँ हैं? सीताजी और मेरे प्यारे भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं?॥४॥
सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन। भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन॥१५९॥
भावार्थ
पुत्रके स्नेहमय वचन सुनकर नेत्रोंमें कपटका जल भरकर पापिनी कैकेयी भरतके कानोंमें और मनमें शूलके समान चुभनेवाले वचन बोली— ॥१५९॥
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