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दोहा 124

चौ०

अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ॥ राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई॥१॥

भावार्थ

आज भी जिसके हृदयमें स्वप्नमें भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम तीनों बटोही आ बसें, तो वह भी श्रीरामजीके परमधामके उस मार्गको पा जायगा जिस मार्गको कभी कोई बिरले ही मुनि पाते हैं॥ १ ॥

चौ०

तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी॥ तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई॥२॥

भावार्थ

तब श्रीरामचन्द्रजी सीताजीको थकी हुई जानकर और समीप ही एक बड़का वृक्ष और ठंडा पानी देखकर उस दिन वहीं ठहर गये। कन्द, मूल, फल खाकर [ रातभर वहाँ रहकर ] प्रातःकाल स्नान करके श्रीरघुनाथजी आगे चले॥ २ ॥

चौ०

देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए॥ राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन॥३॥

भावार्थ

सुन्दर वन, तालाब और पर्वत देखते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी वाल्मीकिजीके आश्रममें आये। श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मुनिका निवासस्थान बहुत सुन्दर है, जहाँ सुन्दर पर्वत, वन और पवित्र जल है॥ ३॥

चौ०

सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले॥ खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं॥४॥

भावार्थ

सरोवरोंमें कमल और वनोंमें वृक्ष फूल रहे हैं और मकरन्द-रसमें मस्त हुए भौंरे सुन्दर गुंजार कर रहे हैं। बहुत-से पक्षी और पशु कोलाहल कर रहे हैं और वैरसे रहित होकर प्रसन्न मनसे विचर रहे हैं॥ ४॥

दो०

सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन। सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन॥१२४॥

भावार्थ

पवित्र और सुन्दर आश्रमको देखकर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी हर्षित हुए। रघुश्रेष्ठ श्रीरामजीका आगमन सुनकर मुनि वाल्मीकिजी उन्हें लेनेके लिये आगे आये॥ १२४॥

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