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दोहा 125

श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद

चौ०

मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा॥ देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने॥१॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीने मुनिको दण्डवत् किया। विप्रश्रेष्ठ मुनिने उन्हें आशीर्वाद दिया। श्रीरामचन्द्रजीकी छवि देखकर मुनिके नेत्र शीतल हो गये। सम्मानपूर्वक मुनि उन्हें आश्रममें ले आये॥ १ ॥

चौ०

मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए॥ सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए॥२॥

भावार्थ

श्रेष्ठ मुनि वाल्मीकिजीने प्राणप्रिय अतिथियोंको पाकर उनके लिये मधुर कन्द, मूल और फल मँगवाये। श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और रामचन्द्रजीने फलोंको खाया। तब मुनिने उनको [ विश्राम करनेके लिये ] सुन्दर स्थान बतला दिये॥ २ ॥

चौ०

बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी॥ तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई॥३॥

भावार्थ

[ मुनि श्रीरामजीके पास बैठे हैं और उनकी ] मङ्गल-मूर्तिको नेत्रोंसे देखकर वाल्मीकिजीके मनमें बड़ा भारी आनन्द हो रहा है। तब श्रीरघुनाथजी कमलसदृश हाथोंको जोड़कर, कानोंको सुख देनेवाले मधुर वचन बोले—॥ ३ ॥

चौ०

तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा॥ अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी॥४॥

भावार्थ

हे मुनिनाथ! आप त्रिकालदर्शी हैं। सम्पूर्ण विश्व आपके लिये हथेलीपर रखे हुए बेरके समान है। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहकर फिर जिस-जिस प्रकारसे रानी कैकेयीने वनवास दिया, वह सब कथा विस्तारसे सुनायी॥ ४॥

दो०

तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ। मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ॥१२५॥

भावार्थ

[ और कहा— ] हे प्रभो! पिताकी आज्ञा [ का पालन ], माताका हित और भरत-जैसे [ स्नेही एवं धर्मात्मा ] भाईका राजा होना और फिर मुझे आपके दर्शन होना, यह सब मेरे पुण्योंका प्रभाव है॥ १२५॥

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