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दोहा 123

चौ०

आगें रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें॥ उभय बीच सिय सोहति कैसें। ब्रह्म जीव बिच माया जैसें॥१॥

भावार्थ

आगे श्रीरामजी हैं, पीछे लक्ष्मणजी सुशोभित हैं। तपस्वियोंके वेष बनाये दोनों बड़ी ही शोभा पा रहे हैं। दोनोंके बीचमें सीताजी कैसी सुशोभित हो रही हैं, जैसे ब्रह्म और जीवके बीचमें माया!॥ १ ॥

चौ०

बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥ उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही॥२॥

भावार्थ

फिर जैसी छबि मेरे मनमें बस रही है, उसको कहता हूँ—मानो वसन्त-ऋतु और कामदेवके बीचमें रति ( कामदेवकी स्त्री ) शोभित हो। फिर अपने हृदयमें खोजकर उपमा कहता हूँ कि मानो बुध ( चन्द्रमाके पुत्र ) और चन्द्रमाके बीचमें रोहिणी ( चन्द्रमाकी स्त्री ) सोह रही हो॥ २ ॥

चौ०

प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता॥ सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ॥३॥

भावार्थ

प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके [ जमीनपर अङ्कित होनेवाले दोनों ] चरणचिह्नोंके बीच-बीचमें पैर रखती हुई सीताजी [ कहीं भगवान्‌के चरणचिह्नोंपर पैर न टिक जाय इस बातसे ] डरती हुई मार्गमें चल रही हैं, और लक्ष्मणजी [ मर्यादाकी रक्षाके लिये ] सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी दोनोंके चरणचिह्नोंको बचाते हुए उन्हें दाहिने रखकर रास्ता चल रहे हैं॥ ३ ॥

चौ०

राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई॥ खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं॥४॥

भावार्थ

श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीकी सुन्दर प्रीति वाणीका विषय नहीं है ( अर्थात् अनिर्वचनीय है ), अतः वह कैसे कही जा सकती है ? पक्षी और पशु भी उस छविको देखकर ( प्रेमानन्दमें ) मग्न हो जाते हैं। पथिकरूप श्रीरामचन्द्रजीने उनके भी चित्त चुरा लिये हैं॥ ४॥

दो०

जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ। भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ॥१२३॥

भावार्थ

प्यारे पथिक सीताजीसहित दोनों भाइयोंको जिन-जिन लोगोंने देखा, उन्होंने भवका अगम मार्ग ( जन्म-मृत्युरूपी संसारमें भटकनेका भयानक मार्ग ) बिना ही परिश्रम आनन्दके साथ तै कर लिया ( अर्थात् वे आवागमनके चक्रसे सहज ही छूटकर मुक्त हो गये )॥ १२३ ॥

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