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दोहा 120

चौ०

जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं॥ एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए॥१॥

भावार्थ

जो ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत्‌में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं। कोई एक कहते हैं—ये स्वभावसे ही सुन्दर हैं [ इनका सौन्दर्य-माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है ]। ये अपने-आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्माके बनाये नहीं हैं॥१॥

चौ०

जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी॥ देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी॥२॥

भावार्थ

हमारे कानों, नेत्रों और मनके द्वारा अनुभवमें आनेवाली विधाताकी करनीको जहाँतक वेदोंने वर्णन करके कहा है, वहाँतक चौदहों लोकोंमें ढूँढ़ देखो, ऐसे पुरुष और ऐसी स्त्रियाँ कहाँ हैं? [ कहीं भी नहीं हैं, इसीसे सिद्ध है कि ये विधाताके चौदहों लोकोंसे अलग हैं और अपनी महिमासे ही आप निर्मित हुए हैं ]॥२॥

चौ०

इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा॥ कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए॥३॥

भावार्थ

इन्हें देखकर विधाताका मन अनुरक्त ( मुग्ध ) हो गया, तब वह भी इन्हींकी उपमाके योग्य दूसरे स्त्री-पुरुष बनाने लगा। उसने बहुत परिश्रम किया, परन्तु कोई उसकी अटकलमें ही नहीं आये ( पूरे नहीं उतरे )। इसी ईर्ष्याके मारे उसने इनको जंगलमें लाकर छिपा दिया है॥३॥

चौ०

एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं॥ ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे॥४॥

भावार्थ

कोई एक कहते हैं—हम बहुत नहीं जानते। हाँ, अपनेको परम धन्य अवश्य मानते हैं [ जो इनके दर्शन कर रहे हैं ] और हमारी समझमें वे भी बड़े पुण्यवान्‌ हैं जिन्होंने इनको देखा है, जो देख रहे हैं और जो देखेंगे॥४॥

दो०

एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर। किमि चलिहहिं मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर॥१२०॥

भावार्थ

इस प्रकार प्रिय वचन कह-कहकर सब नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर लेते हैं और कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीरवाले दुर्गम ( कठिन ) मार्गमें कैसे चलेंगे॥१२०॥

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